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Jammu Kashmir: बारामुला में आज ही के दिन से गूंजा था 'हमलावर होशियार, हम कश्मीरी हैं तैयार'

Sat, 22 Oct 2022 10:22 AM IST
kumar गुलशन कुमार ओमपाल सांब्याल, जम्मू
ओमपाल सांब्याल, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Sat, 22 Oct 2022 10:22 AM IST
सार

आज के दिन 1947 में कबायलियों के साथ पाकिस्तानी सैनिक कत्लोगारत मचाते कश्मीर के बारामुला में घुसे थे। भारतीय सेना के जम्मू.कश्मीर में दाखिल होने तक घाटी में 'हमलावर होशियार, हम कश्मीरी हैं तैयार' का नारा गूंजा।

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jammu kashmir accession: Baramulla attacked by infiltrators 1947 news story in hindi
जम्मू-कश्मीर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत-पाकिस्तान के बीच पहली जंग छेड़ने वाले  22 अक्तूबर 1947 के पाकिस्तानी हमले की आज 75वीं बरसी है। इसी दिन कबायलियों के साथ पाकिस्तानी सैनिक कत्लोगारत मचाते कश्मीर के बारामुला में घुसे थे। भारतीय सेना के जम्मू.कश्मीर में दाखिल होने तक घाटी में 'हमलावर होशियार, हम कश्मीरी हैं तैयार' का नारा गूंजा। वतन परस्ती के जोश से लबरेज बारामुला में आम लोगों ने कबायलियों से दो-दो हाथ किए। 

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मोहम्मद मकबूल शेरवानी जैसे शहीदों ने अपनी जान कुबाज़्न कर पाकिस्तानी मंसूबों को नाकाम कर दिया। शेरवानी सहित अन्य शहीदों को याद करने के लिए स्थानीय कश्मीरियों के साथ सेना भी 23 अक्तूबर को बडगाम में बड़ा आयोजन कर उन शहीदों को श्रद्धांजलि देगी।
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कश्मीर के जाने माने सामाजिक कायज़्कताज़् जावेद बेग 22 अक्तूबर से जुड़ी शौयज़्गाथाओं को स्कूल पाठ्यक्र्तम में शामिल करने और पाकिस्तान के अत्याचार की दास्तान घर.घर सुनाने की वकालत करते हैं। जावेद ने कहा कि जम्मू.कश्मीर को हथियाने के इरादे से पाकिस्तान ने कश्मीरियों पर जुल्म ढाये लेकिन कश्मीरियों ने हिंदुस्तान के साथ जाने की खातिर हमलावरों के मंसूबे अपनी जान देकर भी नाकाम किए। बडगाम में अक्तूबर 1947 के शहीदों की याद में श्रद्धांजलि कायज़्क्र्तम होने जा रहा है।
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पहले जिन्ना को लौटना पड़ा, फिर हमलावरों को मुंह की खानी पड़ी

बारामुला में जन्मे मोहम्मद मक़बूल शेरवानी ने पहले मोहम्मद अली जिन्ना की टू नेशन थ्योरी को नकार दिया और बाद में 1947 के हमले में हमलावरों को गुमराह कर सेना की मदद करते शहादत पाई।
1944 में मोहम्मद अली जिन्ना ने कश्मीर आकर मज़हब के आधार पर अलग मुल्क के लिए कश्मीरियों का साथ मांगा। राष्ट्रप्रेम से भरे शेरवानी ने तब श्शेर ए कश्मीर का क्या इरशादए हिन्दूए मुस्लिमए सिख इत्तेहादश् नारा लगाकर जिन्ना का विरोध किया। शेरवानी की इस नारे के असर से ही जिन्ना को मायूस लौटना पड़ा था। 

22 अक्टूबर 1947 को कबायलियों के भेष में पाकिस्तान ने हमला कर बारामुला तक पहुंच बना ली तो शेरवानी भेस बदलकर लोगों को लड़ने के लिए तैयार करते रहे। बारामुला से कबायली श्रीनगर की ओर बढ़े तो शेरवानी ने ही कबायलियों को गुमराह कर सुमबल इलाके में भटका दिया। इससे सेना को जवाबी हमले में मदद मिलीए लेकिन शेरवानी को हमलावरों ने गोलियों से छलनी कर दिया। सेना की ओर से शेरवानी की याद में सामुदायिक भवन भी बनाया गया है।

पाक की दहशतगर्दी से पर्दा उठाएंगी विस्थापन की यादें

एलओसी के पार पीओजेके में पाकिस्तान दुष्प्रचार के लिए पहले 27 अक्तूबर को काला दिवस मनाता थाए लेकिन अब 22 अक्तूबर की कड़वी सच्चाई को सामने लाने के प्रयास तेज हो गए हैं। सरहद के दोनों तरफ करीब 80 हज़ार लोगों से जुड़े सोशल मीडिया पेज अपना पूंछी परिवार 22 अक्तूबर से 6 दिन तक पाकिस्तान की करतूतों से पदाज़् उठाएगा। 22 अक्तूबर 1947 रू विस्थापन की यादें शीषज़्क से छह दिवसीय ऑनलाइन कायज़्क्र्तम में सरहद के दोनों तरफ से सात.सात पैनलिस्ट होंगे। एलओसी से बिछड़े 400 परिवारों को मिलवा चुकीं सामाजिक कायज़्कताज़् रोमी शमाज़् इसका संचालन करेंगी। 

रोमी ने बताया कि 22 अक्तूबर से पाकिस्तानी हमलावरों ने अविभाजित जम्मू.कश्मीर में कत्लोगारत मचाना शुरू की थी। एलओसी पार भी बहुत से लोग इसे स्वीकार करते हैं। रोमी ने कहा कि पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल रहे अकबर खान की किताब रेडसज़् इन कश्मीर रू स्टोरी ऑफ कश्मीर वॉर में दहशतगदीज़् की स्वीकारोक्ति है। ऐसे ही तथ्यों को सामने रखते हुए एलओसी के दोनों तरफ के लोगों को इतिहास की सच्चाई से रूबरू करवाया जाएगा।

पीओके विस्थापित परिवारों के संगठन एसओएस इंटरनेशनल के अध्यक्ष राजीव चुनी ने 22 अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर के इतिहास का काला दिवस करार देते हुए सभी लोगों से पूरा सप्ताह काला दिवस मनाने की अपील की है। चुनी ने कहा कि मुजफ्फराबाद से लेकर कोटली, भिम्बर, देवा बटाला, मीरपुर, पुँछ, छम्ब, गिलगित, बाल्टिस्तान तक हिन्दू व सिख परिवारों का बेरहमी से कत्ल किया गया। विस्थापित परिवार इस काले दिवस को हर जगह अपने स्तर पर मनाएं।

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