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Jammu News: किशोर का नाम, पते का खुलासा नहीं करने का आदेश
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याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजीव कुमार का फैसला
जम्मू। ऐसा लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कार्यरत न्यायालयों के ध्यान में नहीं लाया गया है। इसलिए वे अपने आदेशों में किशोर की पूरी पहचान का खुलासा कर रहे हैं। ये टिप्पणी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीव कुमार की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अदालतें अधिनियम 2015 की धारा 74 के प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून से अवगत कराया जाए।
न्यायालय ने रजिस्ट्रार जनरल से इस आदेश को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सभी न्यायालयों में प्रसारित करने के लिए कहा। यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया की संघर्षरत बच्चों का नाम और पता कारण सूची या रिकॉर्ड में कहीं भी उल्लेख नहीं किया जाए। यह महत्वपूर्ण निर्णय जस्टिस संजीव कुमार द्वारा किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 102 के तहत पुनरीक्षण याचिका के दौरान पारित किया गया है। इस याचिका को किशोर द्वारा अपने पिता एस त्रिलोक सिंह के माध्यम से अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सांबा की अदालत द्वारा पारित 25 मई 2023 के आदेश के खिलाफ थी। इसके तहत उसने किशोर की जमानत याचिका पर प्रधान किशोर न्याय बोर्ड जख सांबा द्वारा पारित 4 जनवरी 2023 के आदेश को बरकरार रखा था। इसके तहत जेजे बोर्ड ने प्रतिद्वंद्वी दलीलों पर विचार किया और जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों को ध्यान में रखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि याचिकाकर्ता जो बच्चा है, विभिन्न मामलों में शामिल है और जमानत पर रिहा होने पर उसके अपराध दोहराने की पूरी संभावना है। न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने किशोर को जमानत देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को शर्तों के अधीन 50 हजार रुपये के निजी बांड और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि जमा करने पर जमानत पर रिहा किए जाने का हकदार माना जाता है। जेएनएफ
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जम्मू। ऐसा लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कार्यरत न्यायालयों के ध्यान में नहीं लाया गया है। इसलिए वे अपने आदेशों में किशोर की पूरी पहचान का खुलासा कर रहे हैं। ये टिप्पणी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीव कुमार की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अदालतें अधिनियम 2015 की धारा 74 के प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून से अवगत कराया जाए।
न्यायालय ने रजिस्ट्रार जनरल से इस आदेश को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सभी न्यायालयों में प्रसारित करने के लिए कहा। यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया की संघर्षरत बच्चों का नाम और पता कारण सूची या रिकॉर्ड में कहीं भी उल्लेख नहीं किया जाए। यह महत्वपूर्ण निर्णय जस्टिस संजीव कुमार द्वारा किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 102 के तहत पुनरीक्षण याचिका के दौरान पारित किया गया है। इस याचिका को किशोर द्वारा अपने पिता एस त्रिलोक सिंह के माध्यम से अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सांबा की अदालत द्वारा पारित 25 मई 2023 के आदेश के खिलाफ थी। इसके तहत उसने किशोर की जमानत याचिका पर प्रधान किशोर न्याय बोर्ड जख सांबा द्वारा पारित 4 जनवरी 2023 के आदेश को बरकरार रखा था। इसके तहत जेजे बोर्ड ने प्रतिद्वंद्वी दलीलों पर विचार किया और जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों को ध्यान में रखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि याचिकाकर्ता जो बच्चा है, विभिन्न मामलों में शामिल है और जमानत पर रिहा होने पर उसके अपराध दोहराने की पूरी संभावना है। न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने किशोर को जमानत देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को शर्तों के अधीन 50 हजार रुपये के निजी बांड और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि जमा करने पर जमानत पर रिहा किए जाने का हकदार माना जाता है। जेएनएफ
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