{"_id":"680171fc8fa334c4b2014d2d","slug":"jammu-education-world-heritage-day-jammu-news-c-385-1-ja21006-105983-2025-04-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"पांडुलिपियां इतिहास और पहचान की वाहक : वानी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पांडुलिपियां इतिहास और पहचान की वाहक : वानी
Fri, 18 Apr 2025 02:56 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
Updated Fri, 18 Apr 2025 02:56 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जेयू में विश्व विरासत दिवस पर हुआ एक दिवसीय पांडुलिपि प्रदर्शनी सह कार्यशाला का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। पांडुलिपियां संचार के साथ-साथ इतिहास, भावनाओं और पहचान के वाहक हैं। यह बातें मुख्यमंत्री के सलाहकार जेबी नसर असलम वानी ने वीरवार को जम्मू विश्वविद्यालय में वीरवार को विश्व विरासत दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कहीं।
इस मौके पर जम्मू क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन नई दिल्ली के अनुसंधान केंद्र के पांडुलिपि संरक्षण केंद्र के सहयोग से एक दिवसीय पांडुलिपि प्रदर्शनी सह कार्यशाला का भी हुई। इसका आयोजन कुलपति प्रो. उमेश राय की अध्यक्षता में हुआ।
प्रो. राय ने कहा कि हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम इन क्षेत्रों में कितने शिक्षक या शोधकर्ता तैयार कर सकते हैं। अगर हम भाषा अध्ययन को सार्थक करियर के अवसरों से नहीं जोड़ते हैं तो हमारे छात्र कहां जाएंगे, यह विचार योग्य है। उन्होंने भाषा विभागों से आईटी और विरासत अध्ययनों के सहयोग से ऐसी संभावनाओं का पता लगाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि एक मिशन है।
विज्ञापन
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। पांडुलिपियां संचार के साथ-साथ इतिहास, भावनाओं और पहचान के वाहक हैं। यह बातें मुख्यमंत्री के सलाहकार जेबी नसर असलम वानी ने वीरवार को जम्मू विश्वविद्यालय में वीरवार को विश्व विरासत दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कहीं।
इस मौके पर जम्मू क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन नई दिल्ली के अनुसंधान केंद्र के पांडुलिपि संरक्षण केंद्र के सहयोग से एक दिवसीय पांडुलिपि प्रदर्शनी सह कार्यशाला का भी हुई। इसका आयोजन कुलपति प्रो. उमेश राय की अध्यक्षता में हुआ।
विज्ञापन
प्रो. राय ने कहा कि हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम इन क्षेत्रों में कितने शिक्षक या शोधकर्ता तैयार कर सकते हैं। अगर हम भाषा अध्ययन को सार्थक करियर के अवसरों से नहीं जोड़ते हैं तो हमारे छात्र कहां जाएंगे, यह विचार योग्य है। उन्होंने भाषा विभागों से आईटी और विरासत अध्ययनों के सहयोग से ऐसी संभावनाओं का पता लगाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि एक मिशन है।
विज्ञापन