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जम्मू: स्वस्थ लाडलों की चाह में दंपत्ति अपना रहे गर्भ संस्कार चिकित्सा पद्धति, सामान्य प्रसव पर ध्यान

Thu, 05 Jan 2023 12:35 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Thu, 05 Jan 2023 12:35 PM IST
सार

जम्मू कश्मीर के सरकारी व निजी चिकित्सा केंद्रों में सीजेरियन प्रसव का ग्राफ 42 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकारी अस्पतालों में भी इसमें तेजी से वृद्धि हुई है। सीजेरियन प्रसव के बाद महिला को कई शारीरिक परेशानियां रहती हैं, लेकिन सामान्य प्रसव में लगभग कोई दिक्कत नहीं होती है।

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Jammu: Couple adopting Garbh Sanskar medical method in the desire of healthy children
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

स्वस्थ लाडले और सुरक्षित व सामान्य प्रसव के लिए दंपत्ति गर्भ संस्कार आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को अपना रहे हैं। पौराणिक काल में इस पद्धति के माध्यम से महिला को सुरक्षित और सामान्य प्रसव के लिए तैयार किया जाता था। उस समय दाइयां इसमें मुख्य भूमिका निभाती थीं, लेकिन समय के साथ दाइयों की संस्कृति खत्म होती चली गई। मगर अब दोबारा सीजेरियन प्रसव से बचने के लिए दंपत्तियों का गर्भ संस्कार पद्धति की तरफ रुझान बढ़ा है। मेट्रो शहर में इस पद्धति पैकेज में लोग लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं, लेकिन सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल जम्मू में यह सुविधा सामान्य दरों में कुछ टेस्टों के माध्यम से दी जा रही है। 

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जम्मू कश्मीर के सरकारी व निजी चिकित्सा केंद्रों में सीजेरियन प्रसव का ग्राफ 42 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकारी अस्पतालों में भी इसमें तेजी से वृद्धि हुई है। सीजेरियन प्रसव के बाद महिला को कई शारीरिक परेशानियां रहती हैं, लेकिन सामान्य प्रसव में लगभग कोई दिक्कत नहीं होती है। गर्भ संस्कार पद्धति में गर्भ में बच्चे में अच्छे गुणों का विकार किया जाता है। इस दौड़ती और आधुनिक जीवनशैली में तनाव आदि कारणों से बड़ी संख्या में बच्चे जन्म से ही शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर पैदा हो रहे हैं। 
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इसका मुख्य कारण गर्भ के दौरान बीज का बेहतर ढंग से विकसित न होना रहता है। आयुर्वेदिक अस्पताल जम्मू में कार्यरत स्त्री विशेषज्ञ डॉ. अरुण गुप्ता बताते हैं कि गर्भ के दौरान एक व्यक्ति की प्रकृति (मिजाज) का निर्धारण होता है। उसकी शारीरिक क्षमता कैसी होगी, मानसिक विकास कैसा होगा और आगे के जीवन में कौन कौन सी बीमारी की आशंका का पता चलता है, लेकिन गर्भ संस्कार चिकित्सा पद्धति से गर्भ अवस्था के दौरान जरूरी क्रियाओं का पालन करके स्वस्थ, मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम बच्चे को जन्म दिया जाता है। 
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इस पद्धति में गर्भधारण से पहले दंपत्ति की बीज शुद्धि, शरीर की शुद्धि, मानसिक शुद्धि, पर्यावरण शुद्धि की जाती है। गर्भधारण से दो माह पहले गर्भ संस्कार की क्रिया शुरू की जाती है। इसमें डाइट, जीवनशैली, पंचकर्मा, शरीर शोधन (उल्टी, दस्ता लगाकर पेट साफ करवाना), बस्ती (चिकित्सीय एनेमिया), जीन स्तर की शुद्धि की जाती है, जिससे गर्भ में शुद्ध बीज का सृजन होता है। इसमें गर्भ धारण के लिए उचित समय बताया जाता है। गर्भ धारण के बाद नौ माह तक महिला को प्रत्येक माह विशेष प्रकार की खुराक, जीवशैली, योग, अध्यात्मक प्रक्रिया करवाई जाती है, जिससे महिला सामान्य प्रसव के लिए तैयार होती है। सामान्य प्रसव के लिए महिला को मालिश, बस्ती आदि क्रियाएं करवाई जाती हैं। अस्पताल में हफ्ते में 2-3 दंपत्ति गर्भ संस्कार चिकित्सा पद्धति पाने के लिए पहुंच रहे हैं।


टेस्ट ट्यूब से भी लाभ न मिलने से दंपत्ति परेशान
बच्चे की चाह में टेस्ट ट्यूब बेबी चिकित्सा पद्धति का सहारा लेने वाले कई दंपत्तियों को यह सुख नहीं मिल पाता है। कई बार इस पद्धति को अपनाने के बाद उनमें शारीरिक और मानसिक परेशानियां होती हैं। आयुर्वेदिक अस्पताल में बच्चे की चाह में ऐसी कई दंपत्ति पहुंच रहे हैं। इसके अलावा बार बार गर्भपात होना, गर्भ न ठहरना, शुक्राणु की कमी आदि समस्याओं को लेकर दंपत्ति पहुंच रहे हैं।

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