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Jammu News: सरवाल अस्पताल में उचित मूल्य की दुकान आवंटन मामले की फिर होगी जांच
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विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निरोधक जम्मू ने वापस किया चालान, दिया आदेश
2012 का है मामला, तत्कालीन विधायक व अस्पताल के सुपरिटेंडेंट पर है भ्रष्टाचार का आरोप
जम्मू। शहर के सरवाल सरकारी अस्पताल परिसर में उचित मूल्य की मेडिकल दुकान के आवंटन में आधिकारिक पद के दुरुपयोग से संबंधित बहुचर्चित मामले में पेश की गई चार्जशीट को वापस कर दिया है। साथ ही इसकी दोबारा जांच का आदेश दिया है।
बता दें कि एंटी करप्शन ब्यूरो ने अस्पताल अधीक्षक के खिलाफ मामला दर्ज किया था। विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निरोधक जम्मू हक नवाज जरगर ने चालान वापस कर जांच दोबारा करने को कहा। ये मामला वर्ष 2012 का है। मामले के अनुसार अभियोजन पक्ष का कहना है कि बलविंदर सिंह द्वारा चिकित्सा अधीक्षक सरकारी अस्पताल सरवाल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी।
इसमें आरोप लगाया गया था कि जिला अस्पताल सरवाल के अधिकारियों व कर्मचारियों ने राजिंदर मेडिकल हॉल के मालिक के साथ मिलीभगत कर अस्पताल परिसर में दुकान के आवंटन के लिए एनआईटी की शर्तों को बदल दिया। दुकान के निर्माण कार्य को सरकारी अस्पताल सरवाल जम्मू के तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा जानबूझकर देरी की गई।
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एसीबी ने मामले की जांच पूरी करने के बाद तत्कालीन मेडिकल सुपरिटेंडेंट डाॅ. अरुण शर्मा, राजिंदर गुप्ता, सुरेश गुप्ता और तत्कालीन विधायक चमन लाल गुप्ता (अब मृत) के खिलाफ चालान पेश किया। जेएनएफ
बहुत ही लापरवाही से की जांच, एजेंसी ने तथ्य गलत तरीके से पेश किए : हक
विशेष न्यायाधीश हक नवाज जरगर ने चालान का अवलोकन करने के बाद कहा कि अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री व प्रस्तुत तर्कों के आधार पर जो तथ्य सामने आए हैं उनसे पता चलता है कि जांच बहुत ही लापरवाही से की गई है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि जांच एजेंसी ने तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है। बहुत से प्रश्नों के उत्तर अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से नहीं मिल पा रहे हैं। अदालत के लगता है कि इस मामले की दोबारा जांच होनी चाहिए। हालांकि, जांच एजेंसी को स्वयं ही यह कार्य करना चाहिए था।
अदालत के सामने दो परिस्थितियां
न्यायालय के समक्ष ऐसी स्थिति है जहां अभियुक्तों पर आरोप लगाए जा सकते हैं या उन्हें आरोपमुक्त किया जा सकता है। यदि आरोप तय किए जाते हैं, तो सुनवाई शुरू हो जाएगी तथा निष्पक्ष सुनवाई के लिए तथ्य बिल्कुल स्पष्ट होने चाहिए, जो कि खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यहां ऐसा नहीं है। अगला विकल्प अभियुक्तों को आरोपमुक्त करना हो सकता है, लेकिन यह भी अनुचित प्रतीत होता है, क्योंकि जांच अधिकारी तथा पर्यवेक्षी अधिकारियों की चूक के कारण कार्यवाही को छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह कानून की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
दोबारा जांच करें और रिपोर्ट लाएं
जज ने कहा कि वास्तव में खराब और लापरवाहीपूर्ण जांच का मनोबल गिराने वाला प्रभाव होता है। ये हर क्षेत्र में कानून की प्रक्रिया के मूल उद्देश्य को ही प्रभावित करता है। विशेष रूप से भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में। जिनका उद्देश्य न केवल समाज में बेलगाम भ्रष्टाचार को रोकना है, बल्कि अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र प्रभावी ढंग से न्याय के कटघरे में लाना भी है। मेरी समझ से उचित यही होगा कि जांच अधिकारी विचार-विमर्श करें और फिर एक आगे की जांच रिपोर्ट लेकर आएं। इसके बाद मामले पर आरोप/मुक्ति के संबंध में चर्चा की जा सके।
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2012 का है मामला, तत्कालीन विधायक व अस्पताल के सुपरिटेंडेंट पर है भ्रष्टाचार का आरोप
जम्मू। शहर के सरवाल सरकारी अस्पताल परिसर में उचित मूल्य की मेडिकल दुकान के आवंटन में आधिकारिक पद के दुरुपयोग से संबंधित बहुचर्चित मामले में पेश की गई चार्जशीट को वापस कर दिया है। साथ ही इसकी दोबारा जांच का आदेश दिया है।
बता दें कि एंटी करप्शन ब्यूरो ने अस्पताल अधीक्षक के खिलाफ मामला दर्ज किया था। विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निरोधक जम्मू हक नवाज जरगर ने चालान वापस कर जांच दोबारा करने को कहा। ये मामला वर्ष 2012 का है। मामले के अनुसार अभियोजन पक्ष का कहना है कि बलविंदर सिंह द्वारा चिकित्सा अधीक्षक सरकारी अस्पताल सरवाल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी।
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इसमें आरोप लगाया गया था कि जिला अस्पताल सरवाल के अधिकारियों व कर्मचारियों ने राजिंदर मेडिकल हॉल के मालिक के साथ मिलीभगत कर अस्पताल परिसर में दुकान के आवंटन के लिए एनआईटी की शर्तों को बदल दिया। दुकान के निर्माण कार्य को सरकारी अस्पताल सरवाल जम्मू के तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा जानबूझकर देरी की गई।
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एसीबी ने मामले की जांच पूरी करने के बाद तत्कालीन मेडिकल सुपरिटेंडेंट डाॅ. अरुण शर्मा, राजिंदर गुप्ता, सुरेश गुप्ता और तत्कालीन विधायक चमन लाल गुप्ता (अब मृत) के खिलाफ चालान पेश किया। जेएनएफ
बहुत ही लापरवाही से की जांच, एजेंसी ने तथ्य गलत तरीके से पेश किए : हक
विशेष न्यायाधीश हक नवाज जरगर ने चालान का अवलोकन करने के बाद कहा कि अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री व प्रस्तुत तर्कों के आधार पर जो तथ्य सामने आए हैं उनसे पता चलता है कि जांच बहुत ही लापरवाही से की गई है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि जांच एजेंसी ने तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है। बहुत से प्रश्नों के उत्तर अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से नहीं मिल पा रहे हैं। अदालत के लगता है कि इस मामले की दोबारा जांच होनी चाहिए। हालांकि, जांच एजेंसी को स्वयं ही यह कार्य करना चाहिए था।
अदालत के सामने दो परिस्थितियां
न्यायालय के समक्ष ऐसी स्थिति है जहां अभियुक्तों पर आरोप लगाए जा सकते हैं या उन्हें आरोपमुक्त किया जा सकता है। यदि आरोप तय किए जाते हैं, तो सुनवाई शुरू हो जाएगी तथा निष्पक्ष सुनवाई के लिए तथ्य बिल्कुल स्पष्ट होने चाहिए, जो कि खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यहां ऐसा नहीं है। अगला विकल्प अभियुक्तों को आरोपमुक्त करना हो सकता है, लेकिन यह भी अनुचित प्रतीत होता है, क्योंकि जांच अधिकारी तथा पर्यवेक्षी अधिकारियों की चूक के कारण कार्यवाही को छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह कानून की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
दोबारा जांच करें और रिपोर्ट लाएं
जज ने कहा कि वास्तव में खराब और लापरवाहीपूर्ण जांच का मनोबल गिराने वाला प्रभाव होता है। ये हर क्षेत्र में कानून की प्रक्रिया के मूल उद्देश्य को ही प्रभावित करता है। विशेष रूप से भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में। जिनका उद्देश्य न केवल समाज में बेलगाम भ्रष्टाचार को रोकना है, बल्कि अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र प्रभावी ढंग से न्याय के कटघरे में लाना भी है। मेरी समझ से उचित यही होगा कि जांच अधिकारी विचार-विमर्श करें और फिर एक आगे की जांच रिपोर्ट लेकर आएं। इसके बाद मामले पर आरोप/मुक्ति के संबंध में चर्चा की जा सके।