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जम्मू कश्मीर के वाशिंदों को विशेष अधिकार जायज
Updated Fri, 04 Dec 2015 10:41 PM IST
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जम्मू एवं कश्मीर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि संविधान के अनुच्छेद -35ए के तहत राज्य के वाशिंदों को विशेष अधिकार मिला हुआ है। इस प्रावधान को अब तक चुनौती नहीं दी गई है, यह संविधान का स्थायी लक्षण है।
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सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में जम्मू एवं कश्मीर राज्य ने कहा कि 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के तहत संविधान में अनुच्छेद -35ए को जोड़ा गया था। इसके तहत राज्य के बाशिंदों को विशेष अधिकार और सुविधाएं प्रदान की गई थी।
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इसके तहत राज्य सरकार को अपने राज्य के बाशिंदों के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार है। राज्य सरकार ने यह जवाब ‘वी द पीपुल’ नामक एक गैर सरकारी संगठन की जनहित याचिका पर दिया है।
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याचिका में अनुच्छेद-35ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। राज्य सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति को संविधान में नए प्रावधानों को सम्मिलित करने का अधिकार मिला हुआ है।
राज्य सरकार ने कहा कि इस याचिका में उस मूर्त कानून को छेड़ने की कोशिश की गई है जिसे सभी ने स्वीकार किया हुआ है। साथ ही राष्ट्रपति के इस आदेश को 60 वर्षों के बाद चुनौती दी गई है।
चुनौती देने का कोई मतलब नहीं
वर्षों से यह कानून चलता आ रहा है, ऐसे में इसे चुनौती देने का कोई मतलब नहीं है। मालूम हो कि जनहित याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रपति को आदेश के जरिए संविधान में फेरबदल करने का अधिकार नहीं है।
1954 के राष्ट्रपति काआदेश एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर की गई थी। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद-35ए और अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है लेकिन ये प्रावधान उन लोगों के साथ भेदभावपूर्ण है जो दूसरे राज्यों से आकर वहां बसे हैं।
ऐसे लोग न तो वहां संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही स्थानीय चुनावों में उन्हें वोट देने पर पाबंदी है। हलफनामे में सरकार ने याचिकाकर्ता संगठन के इस तर्क पर भी आपत्ति जताई है कि सिर्फ अनुच्छेद-368 के तहत ही संविधान में संशोधन किया जा सकता है। सरकार ने कहा कि अनुच्छेद-370 के तहत आने वाले मसलों पर अनुच्छेद-368 आड़े नहीं आता।
1954 के राष्ट्रपति काआदेश एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर की गई थी। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद-35ए और अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है लेकिन ये प्रावधान उन लोगों के साथ भेदभावपूर्ण है जो दूसरे राज्यों से आकर वहां बसे हैं।
ऐसे लोग न तो वहां संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही स्थानीय चुनावों में उन्हें वोट देने पर पाबंदी है। हलफनामे में सरकार ने याचिकाकर्ता संगठन के इस तर्क पर भी आपत्ति जताई है कि सिर्फ अनुच्छेद-368 के तहत ही संविधान में संशोधन किया जा सकता है। सरकार ने कहा कि अनुच्छेद-370 के तहत आने वाले मसलों पर अनुच्छेद-368 आड़े नहीं आता।