जम्मू-कश्मीरः निजाम बदलने के बाद दरबार मूव की व्यवस्था भी बदलेगी, जानिए क्या होंगे इसके फायदे
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निजाम बदलने के बाद अब जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव की व्यवस्था में बदलाव पर पुनर्विचार शुरू हो गया है। दरबार मूव पर हर साल होने वाले अरबों के खर्च को कम करने और कामकाज सुचारू बनाए रखने के लिए नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। एलजी प्रशासन कर्मचारियों को छोड़ केवल प्रशासनिक सचिवों को दरबार के साथ मूव करने पर विचार कर रहा है। इससे साल भर दोनों सचिवालय में कामकाज भी सुचारू रहेगा और दरबार की व्यवस्था भी कायम रहेगी। अगले साल से ही व्यवस्था लागू करने की तैयारी है।
दरबार मूव की परंपरा के साथ करीब दस हजार मुलाजिमों के अलावा रिकॉर्ड के हर छह महीने के बाद श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से श्रीनगर ले जाने में समय और राशि दोनों की बरबादी होती है। दरबार
मूव पर सालाना करीब 600 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार उप राज्यपाल ने इस व्यवस्था पर होने वाले खर्च की पूरी जानकारी ली है। कर्मचारियों को यथावत रखकर दरबार मूव में केवल प्रशासनिक सचिवों के ही श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से श्रीनगर जाने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है।
हालांकि, जेएंडके यूटी प्रशासन के अधिकारी इस पर कुछ भी ऑन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं हैं, लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना का कहना है कि पार्टी ने भी इस बाबत उप राज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू और केंद्र सरकार के समक्ष यह मामला उठाया है। दरबार मूव पर खर्च होने वाले अरबों रुपये लोगों के विकास पर लगाए जा सकते हैं। जल्द ही इस पर कुछ फैसला हो सकता है।
दस हजार मुलाजिम करते हैं दरबार के साथ मूव
दरबार मूव की व्यवस्था में बदलाव के फार्मूले के तहत जिन विभागों का केवल एक ही निदेशालय है उनके दो निदेशालय बनाने की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है। इससे जम्मू और श्रीनगर दोनों ही जगह साल भर कामकाज सुचारू रूप से चल सकेगा। रोजगार, तकनीकी शिक्षा, जनजातीय मामले, युवा सेवाएं एवं खेल विभाग, फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स, लोकल फंड, ऑडिट एवं पेंशन और रूरल सेनीटेशन के निदेशालय दो जगह बनाने पर विचार किया जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव परंपरा के तहत करीब दस हजार मुलाजिम एवं अधिकारी हर छह महीने के बाद श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से श्रीनगर मूव करते हैं। इसके लिए प्रत्येक कर्मचारी को हर दरबार मूव पर 15 हजार रुपये टीए के रूप में मिलते हैं। सरकारी क्वार्टरों के अलावा अधिकारियों-कर्मचारियों को होटलों और निजी कोठियों को किराए पर लेकर ठहराया जाता है। सरकारी रिकॉर्ड को हर छह महीने पर एक-जगह से दूसरी जगह मूव करने में भी करोड़ों की राशि खर्च होती है।