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Jammu Ground Report: दिग्गजों की चौकड़ी में फंसी ये सीट, शिरमल रोटी सरीखे तप रहे राजनीति दल; इसलिए खुश मतदाता

Wed, 11 Sep 2024 02:18 PM IST
शाहरुख खान अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला, श्रीनगर
अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला, श्रीनगर Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 11 Sep 2024 02:18 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर की यह सीट दिग्गजों की चौकड़ी में फंसी है। शिरमल रोटी की तरह राजनीति के तंदूर में उम्मीदवार तप रहे हैं। नेकां के मीर, पीडीपी के सैयद बशीर, डीपीएपी के नीलूरा और भाजपा के अर्शीद भट मैदान में है। 

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Jammu and Kashmir Assembly Election Rajpora Assembly Constituency NC Pdp DPAP News in Hindi
Jammu and Kashmir Assembly Election - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजपोरा अपनी विश्व प्रसिद्ध शिरमल रोटी के लिए जाना जाता है। इस विधानसभा क्षेत्र में राजनीति की परतें इस रोटी के रेशों की तरह गहरी हैं। जीत के लिए उम्मीदवार राजनीति के तंदूर में शिरमल रोटी की तरह तप रहे हैं। फिलहाल यह सीट चार दिग्गजों में फंस चुकी है। 
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दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के राजपोरा विधानसभा क्षेत्र में तीन क्षेत्रीय और एक राष्ट्रीय पार्टी के चार उम्मीदवार आमने-सामने हैं। यहां से 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। तीन दशक में पहली बार कोई कश्मीरी पंडित महिला डेजी रैना भी यहां रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) की टिकट से अपनी किस्मत आजमा रही हैं।
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चार मुख्य उम्मीदवारों में नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के गुलाम मोहिउद्दीन मीर, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के सैयद बशीर अहमद, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (डीपीएपी) के गुलाम नबी वानी नीलूरा और आम आदमी पार्टी (आप) के मुदस्सिर हसन शामिल हैं। नेकां के गुलाम मोहिउद्दीन मीर पुलवामा जिले के मुर्रन गांव के रहने वाले हैं। मीर 1996 में राजपोरा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक रहे लेकिन पीडीपी उम्मीदवारों से पिछले तीन चुनाव लगातार हार गए।
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पीडीपी के सैयद बशीर अहमद शाह राजपोरा क्षेत्र के निवासी हैं। इन्होंने 2002 और 2008 में दो बार चुनाव जीता है। 2014 में हसीब द्राबू को टिकट दिए जाने के बाद ये पार्टी नाराज हो गए। इन्हें 2014 में ही पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पीडीपी से निष्कासित कर दिया गया। सैयद ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन जीत द्राबू को मिली। हार के बाद वह वह अपनी पार्टी में चले गए, लेकिन अब पीडीपी में लौट आए हैं।

पेशे से इंजीनियर गुलाम नबी निलूरा को डीपीएपी ने मौका दिया है। राजनीति इन्हें विरासत में मिली है। इनके पिता और भाई दोनों राजोपारा सीट को तीन बार जीतकर नेकां की झोली में डाल चुके हैं। पिता गुलाम कादिर वानी के निधन और भाई नजीर अहमद वानी की 1990 में हुई हत्या के बाद नेकां ने गुलाम वानी निलूरा को टिकट नहीं दिया। 

 

इससे उन्होंने 2014 में निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन सफल नहीं हुए। वानी शाहूरा गांव से एकमात्र उम्मीदवार हैं। इस पंचायत में लगभग दो दर्जन गांव शामिल हैं। यह गांव नतीजों को प्रभावित करने का मादा रखता है। राजपोरा इलाके के रहने वाले मुदस्सिर हसन भी खुद को प्रमुख दावेदारों में पेश करने की कोशिश में लगे हैं।

 

भाजपा उम्मीदवार अर्शीद अहमद भट भी मजबूती के साथ डटे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, गुलाम नबी वानी निलूरा के पिता और भाई नेकां के बड़े नेता रहे हैं इसलिए निलूरा नेकां के वोट बैंक में सेंध लगाकर परेशानी खड़ी कर सकते हैं। पीडीपी इसका फायदा उठाने की फिराक में है। हालांकि पीडीपी भी एक निष्काषित और पार्टी बदलकर आए उम्मीदवार को उतारने कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में चुनौतियों का सामना कर रही है। 

 

2014 में नेकां के गुलाम मोहिउद्दीन मीर और निर्ललीय गुलाम नबी निलूरा (अब डीपीएपी प्रत्याशी) को संयुक्त रूप से लगभग 21,000 वोट मिले थे जबकि द्राबू को 18,000 वोट मिले। नेकां के वोट विभाजन से पीडीपी को फायदा मिला था। निलूरा के गांव शाहूरा बस्ती के वोट, भाजपा व महिला कश्मीरी पंडित उम्मीदवारों और निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर ही सब निर्भर है कि ऊंट किस करवट बैठेगा।
 

राजपोरा सीट की विशेषता
पुलवामा जिले की सबसे बड़ी सीट
1,09,543 पंजीकृत मतदाता
54,554 पुरुष, 54,983 महिलाएं
 

10 साल में क्या बदला
इंडोर क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण
जल आपूर्ति बेहतर हुई
बेहतर सड़क कनेक्टिविटी

किसकी आस
-युवाओं को रोजगार चाहिए
-रोमशी नाले पर पुल चाहिए
-जल्द डिग्री कॉलेज चाहिए

विकास से ग्रामीण खुश, रुके काम पूरे न होने की कसक
राजपोरा के अयूब अहमद व द्रबगाम गांव के मयस्सर अहमद ने बताया कि राजपोरा क्षेत्र में कई विकासात्मक कार्य हुए हैं। सैटेलाइट फ्रूट मंडी खुली है। इंडोर स्टेडियम बना है। हमारे क्षेत्र में 24x7 अस्पताल खुल गया है, जिससे दूर-दराज के निवासियों को सेहत सुविधा मिली। नियाज अहमद ने बताया कि हमारे क्षेत्र में मेगा सैटेलाइट फ्रूट मंडी तो खुली लेकिन बुनियादी सुविधाएं नहीं है। इसे विकसित किया जाना चाहिए। रोमशी नाले पर पुल का निर्माण 6 महीने से रुका है। रोजगार यहां बड़ा मुद्दा है।
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