जम्मू-कश्मीर : आतंकियों की तलाश में आगे बढ़ी सेना, जंगल में आग लगाने वाले गोले दागे
पैरा कमांडो और एसओजी की टुकड़ियां एक छोर से जंगल खंगालने में जुटीं। झाड़ियों को जलाकर आतंकियों के मूवमेंट का पता लगाने की रणनीति।
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मेंढर के भाटादूड़ियां जंगल में आतंकियों को खोजने के लिए अब आग लगाने वाले गोले बरसाए जा रहे हैं। बुधवार को सेना ने सुबह दस और दोपहर दो बजे यह गोले बरसाए, जिससे जंगल में आग लग गई। यह गोले आतंकियों के संभावित ठिकानों के पास फेंके गए। इससे झाड़ियों के झुरमुट जल रहे हैं।
वहीं, सेना और एसओजी ने एक तरफ से आतंकियों की तलाश के लिए घेराबंदी कसना शुरू कर दी है। बुधवार को जंगल के एक छोर से पैरा कमांडो और एसओजी की टुकड़ियां जंगल को खंगालते हुए आगे बढ़ीं। हालांकि देर शाम तक आतंकियों का सुराग नहीं लग पाया है।
चमरेड़ के जंगल में 11 अक्तूबर को आतंकियों के पहले हमले के बाद 14 अक्तूबर को भाटादूड़ियां में घात लगाकर हमला किया गया था। दोनों हमलों में दो जेसीओ समेत नौ जवान शहीद हो गए। भौगोलिक परिस्थितियों की चुनौती को देखते हुए इस ऑपरेशन को विशेष एहतियात के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है।
मंगलवार को सेना अध्यक्ष एमएम नरवणे ने ऑपरेशन क्षेत्र का दौरा कर बड़े प्रहार के निर्देश दिए थे। इलाके के लोगों को घरों के भीतर रहने को कहा गया है। बुधवार सुबह होने पर अतिरिक्त जवानों को जंगल के एक छोर से भीतर भेजा गया, वहीं एक तरफ से आग लगाने वाले गोले दागे गए। सेना ने हालात की समीक्षा करने के बाद ऑपरेशन की रणनीति में यह बदलाव किया है।
घाटी से पहुंचे श्रमिकों को नहीं मिल रहीं सीटें, तीन दिन से कर रहे इंतजार
कश्मीर से बीते दिन दिन में हजारों की संख्या में प्रवासी श्रमिक जम्मू पहुंच रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के रहने वाले हैं। इन राज्यों के लिए जम्मू से जाने वाली ट्रेनों में सीटों के लिए मारामारी है। ट्रेनों में जरनल बोगी न होने से आरक्षित सीट बुक न हो पाने पर श्रमिक परेशान हैं। इनकी बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के लिए विशेष ट्रेन चलाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए श्रमिकों की संख्या जुटाई जा रही है।
जम्मू रेलवे स्टेशन परिसर में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक पहुंचे हैं। कामगार जिया-उल हक बंगाल के रहने वाले हैं और 18 अक्तूबर को जम्मू पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि हमारा 15 लोगों का समूह है। घाटी से अचानक आना पड़ा, जिसके कारण टिकट कर्न्फम नहीं करवा सके। दो दिन से ट्रेन में सीटें बुक करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक नहीं मिली। टिकट बुक न होने से ट्रेन में बैठने नहीं दे रहे। ट्रेन में अगर जरनल बोगी होती तो जाने में परेशानी नहीं होती। सरकार को चाहिए या तो ट्रेन में अतिरिक्त बोगी लगाए या फिर विशेष ट्रेन चलाए ताकि वे लोग घर जा सकें। उन्होंने कहा कि दो दिनों से रेलवे परिसर में सोने को मजबूर है, सरकार का हमारी तरफ कोई ध्यान नहीं है।
जीआरपी के साथ मिलकर घाटी से पहुंच रहे श्रमिकों की संख्या जुटा रहे हैं। इसके बाद यह जानकारी डीआरएम कार्यालय फिरोजपुर भेजी जाएगी। डीआरएम कार्यालय से मंजूरी मिलने के बाद ही विशेष ट्रेन चलाने या ट्रेन में अतिरिक्त बोगी लगाने का कोई फैसला लिया जाएगा।
- बलदेव राज, एडीआरएम जम्मू
आतंकवाद विरोधी अभियान प्रभावित
कश्मीर में आतंकी घटनाओं में वृद्धि के साथ केंद्र शासित प्रदेश में सुरक्षा स्थिति से निपटने वाले अधिकारियों ने लगातार हाई-प्रोफाइल यात्राओं की ओर इशारा करते कहा कि इससे आतंकवाद विरोधी अभियान प्रभावित हुए हैं। कश्मीर के स्थानीय राजनीतिक दलों से संबंधित नेताओं ने भी वीवीआईपी शख्सियतों के यहां के दौरे को आतंकी हमलों में वृद्धि का कारण बताया है।
उनका कहना है कि इन दौरों से पुलिस और प्रशासन दोनों का ध्यान इन वीवीआईपी की तरफ था। बता दें कि घाटी में अल्पसंख्यकों और गैर स्थानीय लोगों पर हुए आतंकी हमलों से पहले यहां का सुरक्षा ग्रिड वीवीआईपी दौरों के साथ लगा हुआ था। जानकारी के अनुसार घाटी में मंत्रियों, संसदीय प्रतिनिधिमंडल, न्यायाधीशों और वरिष्ठ अधिकारियों सहित 300 से अधिक वीआईपी दौरे हुए हैं। इनमें नरेंद्र मोदी सरकार के कम से कम 70 मंत्री भी शामिल थे।
प्रदेश कांग्रेस के महासचिव सुरिंदर सिंह चन्नी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब से मोदी सरकार बनी है तब से जम्मू-कश्मीर को एक लेबोरेटरी के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें पहले बैक-टू-विलेज चलता रहा। उसमें भी मंत्रियों का आना-जाना रहा और वो हर इलाके में घूमते रहे, जिससे एसएचओ से लेकर एसएसपी तक सभी उनके इर्दगिर्द घूमते रहे। इससे सुरक्षा इंतजाम बिगड़े। बीते डेढ़ महीने में जितने मंत्री यहां आए हैं, इतना हुजूम इससे पहले कभी नहीं देखा।
चन्नी ने कहा कि न केवल मंत्रियों और उनके परिवारों पर लाखों का खर्च सरकारी विभागों द्वारा किया गया। उनका उद्देश्य केवल अपने परिवारों को घुमाना था। उनके दौरे से सबसे बड़ा नुकसान प्रदेश में यह हुआ कि एक बार फिर से आतंकवाद को बढ़ावा मिला। आतंकी गावों से शहरों की ओर और जंगलों से बस्तियों के ओर आने शुरू हो गए। इसका नतीजा टारगेट किलिंग रहा। अगर सिक्योरिटी फोर्सेज अपना सामान्य काम करती तो ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी नहीं होती।
जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के नेता जगमोहन सिंह रैना ने भी कहा कि कश्मीर घाटी में 300 से अधिक वीवीआईपी शख्सियतों के यहां आने से पुलिस और प्रशासन का ध्यान उनके दौरों पर केंद्रित रहा। यही कारण है कि इसके चलते स्थानीय परिदृश्य बाधित हुआ और ऐसी घटनाएं कश्मीर में एक बार फिर से देखने को मिली। रैना ने यह भी कहा कि एक कारण पिस्तौल जैसे छोटे हथियारों की सीमा पार से तस्करी भी है, जिनसे आतंकियों को वारदातों को अंजाम देने में आसानी होती है। मंत्री आए लेकिन आम जनता के बजाय अपने लोगों से ही मिलते रहे।
सुरक्षा ग्रिड के शीर्ष सूत्रों की मानें तो सेना की मदद कम से कम 30 से अधिक मौकों पर आंतरिक क्षेत्रों में वीआईपी दौरे के लिए मांगी गई। खासकर उत्तरी और दक्षिण कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में जहां खतरे की धारणा बहुत अधिक है। एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा कि सुरक्षाबल या तो ऑपरेशन पर या वीआईपी यात्राओं पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। ऐसे दौरे आतंकवाद विरोधी अभियानों में बाधा डाल रहे हैं। एक बड़ी चुनौती हाइब्रिड आतंकी मॉड्यूल की भी है, जो पिस्तौल और ग्रेनेड से हमलों को अंजाम देकर अपने सामान्य कार्यों में लग जाते हैं। पुलिस की सूची में उनका नाम न होने से उन पर शक नहीं जाता।