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Jammu News: अमेरिका-चीन भरोसे लायक नहीं, अग्निवीर ने नाजुक किया नेपाल से रोटी-बेटी का रिश्ता
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- परवमीर चक्र विजेता योगेंद्र यादव ने ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में कई प्रमुख मुद्दों पर की चर्चा
-बोले, कारगिल युद्ध फिजिकल व ऑपरेशन सिंदूर तकनीक से लड़ा गया, दोनों में पाकिस्तान ने घुटने टेके
एचपी चौहान
श्रीनगर। अमेरिका और चीन कभी भरोेसे के लायक नहीं रहे और न आज हैं। कुछ हद तक व्यावसायिक संबद्ध ठीक हैं लेकिन अन्य मोर्चों पर उन पर विश्वास करने का मतलब पांव पर कुल्हाड़ी मारना नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर ही पांव रख देना जैसा है। रही बात पाकिस्तान की तो यह वह भी जानता है कि आमने-सामने की लड़ाई में कभी भी टिक नहीं पाएगा। अग्निवीर योजना पर विचार करना चाहिए, इसने नेपाल से रोटी-बेटी के रिश्ते को कमजोर किया है। ये बातें कारगिल युद्ध के महानायक परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र यादव नेे कहीं। वह शनिवार को श्रीनगर में आयोजित एक समारोह में शामिल होने के दौरान ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत कर रहे थे।
कैप्टन यादव ने कहा, पाकिस्तान छद्म युद्ध लड़ता है। वह जानता है कि यह 1947 का भारत नहीं बल्कि 21वीं सदी का हिंदोस्तान है, जो खिलाफत में उठने वाले हाथों को काट देगा और देखने वाली आंखों को नोंच लेगा। कारगिल युद्ध को याद कर भावुक हुए परमवीर चक्र विजेता ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसके जीवन का सबसे अनमोल गर्व का क्षण होता है कि वह अपनेे सैन्य काल में मातृभूमि के लिए युद्ध लड़े। मैं सौभाग्यशाली हूं कि यह अवसर मुझे मिला और मां भारती की रक्षा करने के दौरान ही देश के सर्वोेच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित होना परम सौभाग्य है।
कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर के बीच क्या अंतर रहा के सवाल पर कैप्टन योगेंद्र ने कहा कि करीब 26 साल पहले कारगिल युद्ध पूरी तरह मानव बल (फिजिकल) के सहारे लड़ा गया था। ऑपरेशन सिंदूर तकनीक के सहारे लड़ा गया जिससे जानमाल की हानि काफी कम हुई। महज कुछ दिनों में पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए।
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‘अग्निवीर’ योजना कितनी कारगर के सवाल पर कैप्टन योगेंद्र ने कहा कि चार साल की नौकरी में छह महीने ट्रेनिंग में निकल जाएंगे तो साढ़े तीन साल की नौकरी में अग्निवीर क्या समझेगा और क्या करेगा? उन्होंने कहा, अग्निवीर के अल्प सेवाकाल व कई अन्य तमाम कमियों के चलते ही सेना के गोरखा रेजीमेंट का अस्तित्व संकट में है। 1947 से आज तक तमाम युद्धों में गूंजने वाला ‘जय महाकाली, आयो गोरखाली’ का उद्घोष सुनाई देना बंद हो जाएगा। पड़ोसी देश नेपाल से रोटी-बेटी का संबद्ध नाजुक मोड़ पर है। क्योंकि गोरखा समुदाय के लोग अपने बेहतर भविष्य के लिए अब विदेशी फौज में भर्ती होना सुरक्षित मान रहे हैं। लिहाजा अग्निवीर योजना पर पुनर्विचार जरूरी है।
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पैदा यूपी में हुआ पर कर्मभूमि जम्मू-कश्मीर रही
सेना के कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात रहे पिता राम करण सिंह यादव से देशभक्ति का जज्बा विरासत में मिलने का ही फल रहा कि महज 16 वर्ष 5 माह की अल्पायु में योगेंद्र यादव फौज में भर्ती हो गए। पहली तैनाती कश्मीर में मिली। उन्होंने कहा, ऐसा लगता है कि ईश्वर ने मुझे मातृृभूमि के लिए लड़ने को ही कश्मीर भेजा था। कारगिल युद्ध के दौरान 22 जून 1999 को माइनस 20 डिग्री के तामपान में लड़ते हुए तोलेलिंग चोटी पर तिरंगा लहराया था। उसके बाद एक दिन और दो रात लगातार चढ़ाई कर टाइगर हिल पर पहुंचे। जहां भीषण लड़ाई में पाकिस्तानियों को नेस्तनाबूद कर सेना ने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया। बुरी तरह घायल होने के चलते 16 माह तक अस्पताल रहे। स्वस्थ हुए तो फिर जम्मू-कश्मीर की सेवा में जुट गए। कुल नौ साल कश्मीर में तैनात रहे।
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फौजी जश्न नहीं मनाता, अगली सफलता में जुट जाता है
25 साल तक सेना में तैनात रहे कैप्टन यादव कहते हैं कि आम नागरिक और फौजी में सबसे बड़ा अंतर यही होता है कि सामान्य व्यक्ति कई दिनों तक किसी सफलता का जश्न मनाता है लेकिन फौजी तत्काल अगली सफलता के लिए जुट जाता है। देश के अलावा उसे और कुछ सोचने का मौका नहीं मिलता। बताया कि रिटायरमेंट के बाद साढ़े तीन साल से वह देश में घूमकर युवाओं को जागरूक कर रहे हैं। अब तक करीब 6.50 लाख युवाओं को देश सेवा के प्रति जागरूक कर चुके हैं। उन्हें बताते हैं कि यह देश रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद और कल्पना चावला का भी है।
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-बोले, कारगिल युद्ध फिजिकल व ऑपरेशन सिंदूर तकनीक से लड़ा गया, दोनों में पाकिस्तान ने घुटने टेके
एचपी चौहान
श्रीनगर। अमेरिका और चीन कभी भरोेसे के लायक नहीं रहे और न आज हैं। कुछ हद तक व्यावसायिक संबद्ध ठीक हैं लेकिन अन्य मोर्चों पर उन पर विश्वास करने का मतलब पांव पर कुल्हाड़ी मारना नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर ही पांव रख देना जैसा है। रही बात पाकिस्तान की तो यह वह भी जानता है कि आमने-सामने की लड़ाई में कभी भी टिक नहीं पाएगा। अग्निवीर योजना पर विचार करना चाहिए, इसने नेपाल से रोटी-बेटी के रिश्ते को कमजोर किया है। ये बातें कारगिल युद्ध के महानायक परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र यादव नेे कहीं। वह शनिवार को श्रीनगर में आयोजित एक समारोह में शामिल होने के दौरान ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत कर रहे थे।
कैप्टन यादव ने कहा, पाकिस्तान छद्म युद्ध लड़ता है। वह जानता है कि यह 1947 का भारत नहीं बल्कि 21वीं सदी का हिंदोस्तान है, जो खिलाफत में उठने वाले हाथों को काट देगा और देखने वाली आंखों को नोंच लेगा। कारगिल युद्ध को याद कर भावुक हुए परमवीर चक्र विजेता ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसके जीवन का सबसे अनमोल गर्व का क्षण होता है कि वह अपनेे सैन्य काल में मातृभूमि के लिए युद्ध लड़े। मैं सौभाग्यशाली हूं कि यह अवसर मुझे मिला और मां भारती की रक्षा करने के दौरान ही देश के सर्वोेच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित होना परम सौभाग्य है।
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कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर के बीच क्या अंतर रहा के सवाल पर कैप्टन योगेंद्र ने कहा कि करीब 26 साल पहले कारगिल युद्ध पूरी तरह मानव बल (फिजिकल) के सहारे लड़ा गया था। ऑपरेशन सिंदूर तकनीक के सहारे लड़ा गया जिससे जानमाल की हानि काफी कम हुई। महज कुछ दिनों में पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए।
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‘अग्निवीर’ योजना कितनी कारगर के सवाल पर कैप्टन योगेंद्र ने कहा कि चार साल की नौकरी में छह महीने ट्रेनिंग में निकल जाएंगे तो साढ़े तीन साल की नौकरी में अग्निवीर क्या समझेगा और क्या करेगा? उन्होंने कहा, अग्निवीर के अल्प सेवाकाल व कई अन्य तमाम कमियों के चलते ही सेना के गोरखा रेजीमेंट का अस्तित्व संकट में है। 1947 से आज तक तमाम युद्धों में गूंजने वाला ‘जय महाकाली, आयो गोरखाली’ का उद्घोष सुनाई देना बंद हो जाएगा। पड़ोसी देश नेपाल से रोटी-बेटी का संबद्ध नाजुक मोड़ पर है। क्योंकि गोरखा समुदाय के लोग अपने बेहतर भविष्य के लिए अब विदेशी फौज में भर्ती होना सुरक्षित मान रहे हैं। लिहाजा अग्निवीर योजना पर पुनर्विचार जरूरी है।
पैदा यूपी में हुआ पर कर्मभूमि जम्मू-कश्मीर रही
सेना के कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात रहे पिता राम करण सिंह यादव से देशभक्ति का जज्बा विरासत में मिलने का ही फल रहा कि महज 16 वर्ष 5 माह की अल्पायु में योगेंद्र यादव फौज में भर्ती हो गए। पहली तैनाती कश्मीर में मिली। उन्होंने कहा, ऐसा लगता है कि ईश्वर ने मुझे मातृृभूमि के लिए लड़ने को ही कश्मीर भेजा था। कारगिल युद्ध के दौरान 22 जून 1999 को माइनस 20 डिग्री के तामपान में लड़ते हुए तोलेलिंग चोटी पर तिरंगा लहराया था। उसके बाद एक दिन और दो रात लगातार चढ़ाई कर टाइगर हिल पर पहुंचे। जहां भीषण लड़ाई में पाकिस्तानियों को नेस्तनाबूद कर सेना ने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया। बुरी तरह घायल होने के चलते 16 माह तक अस्पताल रहे। स्वस्थ हुए तो फिर जम्मू-कश्मीर की सेवा में जुट गए। कुल नौ साल कश्मीर में तैनात रहे।
फौजी जश्न नहीं मनाता, अगली सफलता में जुट जाता है
25 साल तक सेना में तैनात रहे कैप्टन यादव कहते हैं कि आम नागरिक और फौजी में सबसे बड़ा अंतर यही होता है कि सामान्य व्यक्ति कई दिनों तक किसी सफलता का जश्न मनाता है लेकिन फौजी तत्काल अगली सफलता के लिए जुट जाता है। देश के अलावा उसे और कुछ सोचने का मौका नहीं मिलता। बताया कि रिटायरमेंट के बाद साढ़े तीन साल से वह देश में घूमकर युवाओं को जागरूक कर रहे हैं। अब तक करीब 6.50 लाख युवाओं को देश सेवा के प्रति जागरूक कर चुके हैं। उन्हें बताते हैं कि यह देश रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद और कल्पना चावला का भी है।