हुर्रियत मामले पर दिखी 'भारत की कमज़ोरी'
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पाकिस्तान से संबंधों और तीन हुर्रियत नेताओं को उनके घरों में ही नजरबंद को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की भ्रम और अनिर्णय की स्थिति कायम है।
पाकिस्तान से संबंधों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की भ्रम और अनिर्णय की स्थिति कायम है। गुरुवार को तीन हुर्रियत नेताओं को उनके घरों में ही नजरबंद कर लिया गया लेकिन कुछ ही घंटों उनकी नजरबंदी खत्म कर दी गई।
पिछले साल भारत ने पाकिस्तान के साथ वार्ता इसलिए रद्द कर दी थी क्योंकि पाकिस्तानी राजनयिक दिल्ली में हुर्रियत नेताओं से मिले थे। इस बार भारत का कहना है कि वह वार्ता रद्द नहीं करेगा, भले ही राजनयिक हुर्रियत नेताओं से मिल लें।
ये हुर्रियत नेता कौन हैं? सैयद अली गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और यासिन मलिक कौन हैं? ये भारतीय नागरिक हैं। भारत सरकार पाकिस्तानी राजनयिकों को भारत के किसी भी नागरिक से मिलने से रोकती नहीं है। इसी तरह पाकिस्तान सरकार यह तय नहीं करती कि पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक किससे मिलते हैं।
'मुद्दा नहीं है कश्मीर?'
यह कहकर कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज तीन भारतीयों से नहीं मिल सकते, भारत सिर्फ अपनी कमज़ोरी ही जाहिर कर रहा है।
अगर इन तीनों भारतीयों ने अपराध किए हैं तो उन्हें जेल में डाल दें और कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें दोषी साबित करें। आखिरकार भारत ही कहता है कि यहां कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता है, पाकिस्तान की तरह नहीं, जहां समय-समय पर सैनिक तानाशाह राज करते हैं।
ये तीनों भारतीय कश्मीरी हैं और यह कहकर कि पाकिस्तानी इनसे नहीं मिल सकते, भारत कश्मीर को लेकर अपनी असुरक्षा के भाव को ज़ाहिर कर रहा है।
भारत का पक्ष यह है कि भारत प्रशासित कश्मीर में कोई अंदरूनी समस्या नहीं है। समस्या बाहरी है। नियंत्रण रेखा के पार से आने वाले चरमपंथी।
कश्मीर में कोई विवाद नहीं है?
हालांकि, पाकिस्तान के इन तीनों कश्मीरियों से बातचीत पर रोक लगाने के तथ्य का अर्थ यह निकलता है कि कश्मीर में कुछ अंदरूनी समस्या भी है। और अगर समस्या सिर्फ तीन लोगों तक सीमित होती तो कोई भी उन्हें महत्व नहीं देता।
असली समस्या यह है कि हम यह दिखाना चाहते हैं कि कश्मीर में कोई विवाद नहीं है। भारत पाकिस्तान के साथ सिर्फ़ चरमपंथ पर बात करना चाहता है, कश्मीर पर नहीं।
लेकिन पाकिस्तान चरमपंथ को बढ़ावा देता है तो इसकी वजह है कश्मीर। यह मानते हुए कि कश्मीर एक सामान्य मुद्दा नहीं है, लेकिन क्या भारत वास्तव में यह दिखावा कर सकता है कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच कोई मुद्दा नहीं है?
यह कहकर कि पाकिस्तानियों को इन तीन कश्मीरियों से नहीं मिलना चाहिए, भारत एक तरह से कश्मीर को एक मुद्दा बनने दे रहा है। आखिरकार अगर सरताज़ अज़ीज तीन ओड़ियाओं (ओडिशा वालों) से मिलते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होगी।
'मोदी की असली चुनौती'
पाकिस्तानियों और हुर्रियत नेताओं को मिलने देने को लेकर भारत में ज़्यादा आत्मविश्वास होना चाहिए। भारत का मुख्य मुद्दा चरमपंथ है और भारत को इसी बारे में बात करनी चाहिए। भारत चरमपंथ का जवाब चरमपंथ से नहीं दे सकता क्योंकि हमारे यहां चरमपंथ के अड्डे नहीं हैं।
भारत चरमपंथ का जवाब जंग से नहीं दे सकता क्योंकि हम दोनों के पास परमाणु हथियार हैं। इस तरह बातचीत ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।
चरपमंथ पर बात करने के लिए हमें पहले पाकिस्तान से बात करनी होगी। लेकिन दरअसल बातचीत में हमारी रुचि नज़र नहीं आती, अगर हम वार्ता की मेज़ पर यह दिखाते रहेंगे कि कश्मीर कोई मुद्दा ही नहीं है। हम ऐसी अनुचित लक्ष्मण रेखा नहीं खींच सकते कि पाकिस्तानी तीन कश्मीरियों से नहीं मिल सकते।
'सभी लंबित मुद्दों पर चर्चा'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के उफा में दिए संयुक्त बयान में कश्मीर का ज़िक्र नहीं था लेकिन इसमें कहा गया था कि दोनों देश 'सभी लंबित मुद्दों' पर चर्चा करेंगे।
पाकिस्तानियों ने इसका अर्थ यह निकाला कि कश्मीर भी वार्ता के दायरे में शामिल होगा। हम लोग कश्मीर मुद्दे पर बात करने से इतने डरते क्यों हैं?
कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर बढ़िया काम कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है।
नरेंद्र मोदी की असली परीक्षा पाकिस्तान है। एक भ्रमित और बदलने वाली नीति अच्छी विदेश नीति नहीं है।