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एक रैंक घटाने के मामले में सीएस को नोटिस

Sat, 24 Jan 2015 10:20 PM IST
Updated Sat, 24 Jan 2015 10:20 PM IST
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high court deferred to notice of higher education department

बोर्ड आफ स्कूल एजूकेशन (बोस) के चेयरमैन प्रोफेसर नूतन कुमार का एक रैंक घटाने और उनके वेतन से 1.37 लाख रुपये की रिकवरी के मामले में हाईकोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी और अन्य को नोटिस जारी किया है।

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प्रोफेसर ने दायर याचिका में उच्च शिक्षा विभाग के उस कारण बताओ नोटिस को अदालत में चुनौती दी है, जिसमें उनका एक रैंक घटाने के अलावा उनके वेतन से 1,37,500 रुपये रिकवर करने की बात कही गई है।
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नोटिस में कहा गया कि डिग्री कालेज राजोरी में प्रिंसिपल पद पर रहने के दौरान सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा था। हालांकि अदालत ने विभाग की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस पर स्टे लगाने के लिए दायर आवेदन को खारिज कर दिया।
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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट के जस्टिस हसनैन मसूदी ने चीफ सेक्रेटरी, उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त, डिप्टी सेक्रेटरी और गवर्नमेंट कालेज, गांधी नगर की प्रिंसिपल डा. किरण बख्शी (जांच अधिकारी) को नोटिस जारी किया है।

कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस पर स्टे लगाने से किया इंकार

high court deferred to notice of higher education department

कारण बताओ नोटिस पर स्टे लगाने के आवेदन को खारिज करते हुए अदालत ने उच्च शिक्षा विभाग को अगली सुनवाई पर अपनी आपत्ति दर्ज करने को कहा है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता जेयूएंडके सिविल सर्विसेज के नियम 34 के तहत जारी अंतिम कारण बताओ नोटिस को याचिका के माध्यम से खारिज करवाना चाहते हैं।

याचिकाकर्ता के वकील का कहना था कि उनके क्लाइंट को जांच रिपोर्ट के अलावा अन्य कागजात मुहैया नहीं करवाए गए। पूरी जांच जेएंडके सीसीए नियम 1956 के रूल 33 के खिलाफ की गई। उधर एडवोकेट एसएस अहमद ने अदालत को बताया कि इस संबंध में एक याचिका पहले ही खंडपीठ के समक्ष लंबित है और ऐसे में यह याचिका खड़ी नहीं रह सकती।

खंडपीठ के एक फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की हुई है, जिसमें उनके खिलाफ विभागीय जांच के कारण उन्हें बोस चेयरमैन बनाना गैरकानूनी बताया गया है।

वकील का कहना था कि याचिकाकर्ता को इस संबंध में खंडपीठ या फिर सुप्रीम कोर्ट में मामला रखना चाहिए, जिसकी 13 फरवरी 2015 को सुनवाई है। सरकारी वकील ने भी अंतरिम राहत का विरोध किया और जवाब देने के लिए और समय की मांग की।

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