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JK की पर्वतीय जड़ी-बूटियों पर तस्करों की नजर

Wed, 13 May 2015 07:46 PM IST
Updated Wed, 13 May 2015 07:46 PM IST
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herbs ceased at lakhanpur toll plaza

रियासत के प्रवेशद्वार लखनपुर में आबकारी विभाग की पोस्ट पर मंगलवार को दो ट्रकों की जांच के दौरान जड़ी- बूटियों का जखीरा पकड़ा गया। विभाग ने ट्रकों को जब्त कर पकड़ी गई सामग्री का मूल्यांकन शुरू कर दिया है। नियमों के हिसाब से सामग्री पर दस गुना अधिक कर का जुर्माना लगाया जाएगा जिसके बाद ट्रकों को सामान सहित वन विभाग के सुपुर्द किया जाएगा।

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जानकारी के अनुसार, मंगलवार को श्रीनगर से दिल्ली जा रहे दो ट्रकों को टोल पोस्ट के नजदीक जांच के लिए रोका गया। विभाग के डीसी ने बताया कि ट्रकों के दस्तावेजों में खजूर दर्शाई गई थी। फिजिकल वैरिफिकेशन के तहत जब ट्रकों में लोड हुए सामान की जांच की गई तो ऊपरी परत पर खजूर ही भरे गए थे लेकिन निचली सतह के बैग जांचे गए तो उनमें वन उत्पाद निकालने लगे।
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पूरी जांच के बाद पता चला कि ट्रकों में लदे सामान में ज्यादा वजन वन औषधियों का था। वहीं सूचना मिलने पर लखनपुर पहुंचे वन विभाग के प्रतिनिधि ने बताया कि जो सामान पकड़ा गया है प्रथम दृष्टया वह प्रतिबंधित श्रेणी का नहीं है। बहरहाल वन उत्पादों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए बाकायदा अनुमति और औपचारिक दस्तावेजों की जरूरत होती है।
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लेकिन इस मामले में न तो अनुमति थी और न ही विभागीय जांच के दौरान सच्चाई बताई गई। वन विभाग मामले की जांच करेगा जिसके बाद कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

इस बूटी को है सबसे ज्यादा खतरा

herbs ceased at lakhanpur toll plaza

सुदूरवर्ती पर्वतीय इलाकों से जड़ी-बूटियों की तस्करी अरसे से चल रही है। लेकिन हाल के वर्षों में तस्करों ने औषधीय बूटी नाग छतरी पर अपनी नजर गड़ा ली है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश में नाग छतरी की बढ़ती मांग ने तस्करों को बूटी के काले कारोबार के लिए प्रेरित किया है। कठुआ के चुनिंदा इलाकों से नाग छतरी को अंधाधुंध निकाला जा रहा है।

सूत्र ही बताते हैं कि राज्य में नाग छतरी को बड़े तस्कर और ठेकेदार औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। बाद में इसे बाहरी राज्यों तक पहुंचाकर मोटी रकम कमाई जाती है। अमृतसर शहर से लेकर हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में नागछतरी का मूल्य दो से पांच हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है।

पड़ोसी देश चीन में इसका रेट 25 हजार तक है। मोटे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में नाग छतरी बूटी का मूल्य 15 से 20 हजार रुपये प्रति किलोग्राम है। यही वजह है कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सरहदों से सटे कठुआ के पर्वतीय इलाकों से नागछतरी का दोहन तेजी से बढ़ने लगा है।

सूत्रों ने बताया कि भद्रवाह, डुडू बसंतगढ़ और हिमाचल प्रदेश से सटे पर्वतीय इलाकों में नागछतरी प्रचुर मात्रा में है। इस संबंध में वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि नागछतरी का व्यापार पूरी तरह से अवैध है। वर्तमान में नागछतरी का कारोबार रियासत में पूरी तरह से प्रतिबंधित है। पर्वतीय इलाकों से नागछतरी की तस्करी की सूचनाएं लगातार मिलती हैं जिस पर कार्रवाई भी की जाती है।

जड़ी-बूटियों के अस्तित्व पर खतरा

herbs ceased at lakhanpur toll plaza

जड़ी-बूटियों के औषधीय गुण ही इनके खात्मे का कारण बन रहे हैं। खासकर अंधाधुंध तस्करी इसके लिए जिम्मेदार है। जम्मू कश्मीर की भौगोलिक स्थिति कई दुर्लभ जड़ी बूटियों के लिए मुफीद है। लेकिन व्यापक स्तर पर तस्करी की वजह से खास ऊंचाई पर पाई जाने वाली बूटियों का अस्तित्व खतरे में है।

नागछतरी सहित कई अन्य बूटियां हैं जिन्हें इंडेंजर्ड स्पीसिस श्रेणी में रखा गया है। यानी इन बूटियों के अस्तित्व को खतरा है। औषध विज्ञान के एक जानकार के अनुसार, जड़ी बूटियों को पहले माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस श्रेणी में रखा गया था लेकिन वर्तमान में इसका नाम बदलकर नॉनवुड फॉरेस्ट प्रोड्यूस कर दिया गया है।

नागछतरी सहित कई बूटियों में औषधीय गुणों की भरमार है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ी है। पर्वतीय इलाकों की कई बूटियां इंडेंजर्ड स्पीशीस घोषित हो चुकी हैं। ऐसे में इनके कारोबार की कोई अनुमति नहीं है।

क्या है इन जड़ी बुटियों की खासियत

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नागछतरी: 2700 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाने वाली बूटी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल सेक्स हारमोन बढ़ाने के लिए किया जाता है। पेट की बीमारियों के लिए भी यह रामबाण इलाज है।

गुच्छी: औषधीय गुणों के चलते यह बूटी मुंबई से निर्यात के समय 40 से 50 हजार रुपये प्रति किलोग्राम मूल्य हासिल कर जाती है।

कक्कड़सिंघी: चमत्कारिक ढंग से यह बूटी हाइपरटेंशन बीमारी का इलाज करती है। बदलती जीवन शैली में हाइपरटेंशन बीमारी के पीड़ितों की बढ़ती संख्या ने इस बूटी पर दबाव बढ़ा दिया है।

वन ककड़ी: पत्तों से लेकर जड़ों तक बूटी का हर भाग कई औषधीय गुणों से कूट कूट कर भरे होते हैं। जड़ों का निर्यात मूल्य 20 हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक होता है।

सुगंधबाला: खतरे में पड़ी इस बूटी से तेल तैयार किया जाता है। जिसका अलग अलग ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। अत्यधिक दोहन की वजह से यह बूटी भी खतरे में है।

बनक्षा: कफ और एलर्जी के लिए उपयोगी बूटी है। पर्वतीय इलाकों की इस बूटी की निर्यात में व्यापक मांग है। इसके अलावा निचले मैदानी इलाकों में पाई जाने वाली बरेयां और ब्रहमी बूटी में भी औषधीय गुणों की भरमार है।

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