वन्यजीवों पर जलवायु परिवर्तन के असर का होगा अध्ययन
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हिमालयन राज्यों में जलवायु परिवर्तन का वन्यजीवों और इको सिस्टम पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन होगा। मौजूदा समय में सरकार के पास इसके प्रभाव का कोई व्यापक डाटा नहीं।
इसलिए केंद्र सरकार हिमालयन राज्यों में इसका अध्ययन कराना चाहती है। इंडियन नेशनल एक्शन प्लान आफ क्लाइमेट चेंज के अधीन भारतीय वन्यजीव संस्थान और विज्ञान एवं तकनीक विभाग मिलकर इस पर काम करेंगे।
जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम, मिजोरम, त्रिपुरा, असम, बेस्ट बंगाल, हिमाचल प्रदेश, अरुणांचल प्रदेश, नगालैंड और मेघालय में 550 करोड़ अध्ययन पर खर्च होंगे। इन राज्यों में पिघलते ग्लेशियर, बेमौसम बारिश और बादल फटने की घटनाओं में पिछले कुछ सालों से बढ़ोतरी हुई है।
इसका वन्यजीवों और इको सिस्टम पर कितना प्रभाव पड़ा है, इसकी जानकारी के लिए यह अध्ययन होगा। सूत्रों का कहना है कि 30 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पेरिस यात्रा पर जा रहे हैं।
वहां हिमालयन राज्यों में जलवायु परिवर्तन से वन्यजीवों और इको सिस्टम पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी चर्चा होगी। इस चर्चा से पहले केंद्र सरकार चाहती है कि उनके पास हिमालयन राज्यों की पूरी जानकारी हो।
राज्य की 14 वन्य प्रजातियों पर संकट
इंटरनेशनल यूनियन आफ कंजरवेशन नेचर (आईयूसीएन) की रेड डाटा बुक में जम्मू-कश्मीर की 14 वन्य प्रजातियां संकट में हैं। इनमें स्नो लेपर्ड, कॉमन लेपर्ड, ब्राउन बियर, ब्लैक नेक्ड क्रेन, हंगुल, मरखोर, सिरो, मस्क डियर, चिरू, तिब्बतन गजाल, बेस्टन ट्रैगापन, चीप फिजेंट, हिमालयन ताहर, आइबेक्स, गोल्डन इगल शामिल है। मरखोर, चिरू और हंगुल प्रजातियों पर सबसे अधिक खतरा है।
मौजूदा स्थिति
जानकारी के अनुसार इस समय हंगुल की संख्या 160 से 230 के बीच है। जो दो दशक पहले 3 से पांच हजार के बीच थी। इसी तरह मरखोर की संख्या भी 200 के आसपास है। स्नो लेपर्ड की संख्या तीन दशक पहले 3000 से 3500 के बीच थी। अब इनकी संख्या 400 से 500 के बीच है। ब्लैक नेक्ड क्रेन का सर्वे किया जा रहा है, जिसका परिणाम अभी सामने नहीं आया है।
अध्ययन का लाभ
वन्यजीव विभाग के एक उच्च अधिकारी का कहना है कि अध्ययन होने के बाद भारत के पास कम से कम एक जानकारी होगी कि क्लाइमेट बदलने से इन पर कितना प्रभाव पड़ रहा है और इस प्रभाव को कैसे रोका जाए और कम किया जाए।