सीमा पर लगी फेंसिंग ने छीन ली किसानों की जमीन
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वर्ष 2002 में सीमा पर की गई तारबंदी के बाद 22 गांव के किसानों की 1409 कनाल भूमि पर खेतीबाड़ी प्रभावित हुई है। कई स्थानों पर भूमि बंजर हो गई है। वहीं जिन स्थानों पर भूमि अभी खेतीबाड़ी करने लायक है, वहां सिंचाई के साधन नहीं हैं। यानी उनके लिए बारिश ही एकमात्र विकल्प बचता है। ऐसे में वह सिर्फ एक बार गेहूं की फसल ही लगा सकते हैं।
किसान मदन लाल, परस राम, ओम प्रकाश, रामलाल का कहना है कि कई ग्रामीणों की जमीनें तारबंदी के पार हैं। कुछ की जमीन तारबंदी में भी आईं। उनका कहना है कि 2002 के बाद से किसानाें की अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।
अब उस पार खेतीबाड़ी करना बड़ी चुनौती बन गई है। पहले किसान वहां पर पंपसेट लगाकर सिंचाई करते थे। कहने को सीमावर्ती ग्रामीणों की जमीनें हैं, लेकिन खेतीबाड़ी के लिए सहूलियत कुछ भी नहीं है। एक ट्यूबवेल तक नहीं। नहर के पानी व्यवस्था तक नहीं।
तारबंदी में आई भूमि की राहत राशि नहीं मिली
किसानों का कहना है कि आजतक किसानों को तारबंदी में आई भूमि की राहत राशि नहीं मिल पाई है। किसान वहां खेतीबाड़ी भी नहीं कर पा रहे हैं। सिंचाई के लिए नहर व ट्यूबवेल का भी प्रबंध नहीं। इस कारण भी खेतीबाड़ी प्रभावित हो रही।
सुचेतगढ़ पंचायत के सरपंच सवर्ण लाल भगत, गुलाबगढ़ बस्ती पंचायत के सरपंच अर्जुन सिंह का कहना है कि गत वर्ष केंद्र की संसदीय टीम ने तारबंदी में आई भूमि का निरीक्षण किया था, लेकिन अभी तक किसानों को उक्त भूमि की राहत राशि नहीं मिल पाई है।
कोराटाना पंचायत के सरपंच हरनाम सिंह का कहना है कि पिछले वर्ष सीमा सुरक्षा बल की ओर से सैकड़ों एकड़ बंजर भूमि को कृषि योग्य बना कर किसानों को सौंपा गया था। इस पर किसानों ने खेतीबाड़ी के लिए पंपसेट लगाकर पानी की व्यवस्था की है।