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शिव मंदिर को क्यों कहा जाने लगा रुपयों का मंदिर?
टीमडिजिटल/ अमर उजाला, जम्मू
Updated Thu, 17 Jul 2014 06:48 PM IST
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जम्मू शहर में जगह-जगह देवी देवताओं के मंदिर होने के कारण इस शहर को मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। राजेंद्र बाजार के दक्षिण में स्थित पंचबक्तर मंदिर जम्मू के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर शहर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर से आज से लगभग छह सौ साल पहले राजा मालदेव ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करवाई थी।
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इसका नाम पंचबक्तर क्यों पड़ा
इस मंदिर का नाम पंचबक्तर क्यों रखा गया। यह किसी को भी मालूम नहीं है। हालांकि पंचबक्तर की मतलब पांच मुंह वाला होता है।
लेकिन जो शिवलिंग यहां स्थापित किया गया उसमें पांच मुख जैसा कुछ दिखाई नहीं देता है। पुरणों के मुताबिक जब शिव भगवान ने पृथ्वी, वायु, जल, आकाश और अग्नि पंच तत्वों को निगल लिया तो उनका नाम पंचबक्तर पड़ गया।
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राजा मालदेव ने बनवाया था ये मंदिर
एक लिखित प्रमाण के अनुसार राजा रंजीतदेव ने बनवाया था। परन्तु अधिकांश लोग और मंदिर के मंहत का मामना है कि इस मंदिर को 1365 के आसपास राजा मालदेव ने बनवाया था। ये जगह इसलिए भी खास है कि यहां से आप शंभू प्रकट हुए थे।
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एक मंदिर के निर्माण के पीछे एक रोचक कहानी है। कहते है कि यहां पहले जंगल हुआ करता था। यहां पर राजा मालदेव एक अस्तबल बनवाना चाहते थे।
राजा के आदेश के बाद यहां पर अस्तबल का काम शुरु हो गया। लेकिन एक दिन जब एक मजदूर खुदाई कर कर रहा था तभी उसकी कुदाल एक पत्थर से टकराई और वहां से खून निकलने लगा।
जिसके बाद सभी मजदूरों से डरकर काम करना बंद कर दिया। जब यह घटना राजा मालदेव को मालूम चली तो राजा ने वहां पहुंच कर फिर से खुदाई शुरु करवाई तो वहां पर खुदाइ में एक शिवलिंग प्राप्त हुआ।
जिसके बाद राजा ने इस स्थान को पवित्र स्थान मानकर अस्तबल बनाने से रोक दिया। इसके बाद जमीन से निकले शिवलिंग को यहां राजा ने स्थापित करवाकर एक मंदिर का निर्माण करवाया।
क्यों कहा जाने लगा रुपयों का मंदिर
इसके बाद महाराजा प्रताप सिमह ने यहां पर एक नया मंदिर बनवाया और शिवलिंग की वेदी पर चांदी की परत चढ़वाई। मंदिर के फर्श को चांदी को सिक्कों से ढक दिया गया।
जिस कारण से इस मंदिर को रुपयों वाला मंदिर कहा जाने लगा। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव की सवारी बैल को भी पंचबक्तर कहा जाता है। हो सकता है कि उसी के नाम भी इस मंदिर का नाम पंचबक्तर रखा गया हो।
शहर के बीच में होने के कारण त्यौहारों पर इस मंदिर में काफी भीड़ होती है। वहीं यहां पर रक्षाबंधन और शिवरात्रि पर काफी बड़ा मेला भी लगता है।
वस्तुकला के लिहाज से इस मंदिर की बनावट उत्तर भारत में बने मंदिरों से मेल खाता है। इन मंदिरों की उंचाई भी अधिक नहीं होती है।
प्राचीन शिवमंदिरों के सामने बेरी का पेड़ होने से भी मालूम चलता है कि इसकी बनावट कहीं ना कहीं उत्तर भारत की वास्तुकला से प्रभावित है।
खास बात
इस मंदिर की एक और खास बात है कि यहां का जो भी मंहत बनता है और उसकी मृत्यु के बाद उसकी समाधि इसी मंदिर के परिसर में बनाई जाती है। आजतक इस मंदिर की गद्दी पर लगभग तेरह मंहत बैठ चुके हैं। यहां के चौदहवें मंहत परशुराम गिरि जी है। जो 1965 में इस गद्दी पर बैठे थे।