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साधना करते हुए मिलने वाला सुख और अनुभव कृपा से आते हैं
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ज्यौड़ियां। मंडीवाला में चल रहे गायत्री विराट यज्ञ में रविवार को कथा वाचक सुरेश शास्त्री ने चार वेदों के अलावा पुराणों एवं श्रीमद्भागवत महापुराण की सरल भाषा में व्याख्या कर श्रद्धालुओं को निहाल किया। शास्त्री जी ने कहा कि यदि ईमानदारी से साधना की जाए तो हमारी साधना को पुष्टि देने के लिए ईश्वर बहुत से प्रमाण भी भेज देते हैं।
उन्होंने कहा कि साधना करते हुए मिलने वाला सुख और अनुभव कृपा से आते हैं, और कृपा उसको मिलती है जो निरंतर प्रेम व श्रद्धा से साधना में लगा रहता है। प्राणायाम भी अगर सही तरीके से करें, तो मन तुरंत शांत हो जाता है, ठहराव में आ जाता है। अभ्यास करते हुए एक अच्छा अनुभव आपको हो जाए, तो जिंदगी बदल जाएगी। क्योंकि जो आनंद आपको साधना में मिलता है, उसके मुकाबले दुनिया की कोई चीज ठहर ही नहीं पाती। सूर्य की रोशनी, उसकी किरणों का आनंद लेना हो तो हमें घर के दरवाजे खोलकर बाहर खुले में जाना पड़ता है। ऐसे ही सद्गुरु या किसी संत का दर्शन करने का अर्थ है, अपने हृदय के द्वार खोल देना। जो दिल से साधक हो जाता है। वैराग्य इसलिए नहीं आता कि वह ईश्वर को ढूंढ रहा है, बल्कि इसलिए आता है कि उसको अपने अंदर ऐसा कुछ मिल जाता है, जिसके सामने दुनिया फीकी हो जाती है। भीतर के ईश्वरीय नजारे की तुलना में बाहर के दुनियावी नजारों की सुंदरता कुछ भी नहीं है।
भक्ति मार्ग त्याग और बलिदान का मार्ग
विजयपुर/ सांबा। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की तरफ से रविवार को सत्संग का आयोजन किया गया। इस दौरान आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी सुचेतानंद ने संगत को ईश्वर भक्ति के मार्ग की दुर्लभता व महानता के बारे में बताया।
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उन्होंने बताया कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, और ईश्वर भक्ति करके ईश्वर को प्राप्त करना मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक ऐसा व्यक्ति जो काम है, क्रोधी है, लालची है, वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति एक साहसी और बहादुर व्यक्ति करता है। क्योंकि भक्ति मार्ग त्याग और बलिदान का मार्ग है। यह संघर्ष से परिपूर्ण रास्ता है, जिस पर विरले लोग ही चल पाते हैं। मानव जीवन में दूसरी अत्यंत दुर्लभता पूर्ण सतगुरु की शरण का मिलना है। क्योंकि एक सच्चा संत ही अंतर जगत के दर्शन कराने का सामर्थ्य रखता है, उसकी कृपा से ही संघर्ष से परिपूर्ण अत्यंत कठिन भक्ति मार्ग सरल हो जाता है। एक साधक अपनी मंजिल को प्राप्त कर पाता है।
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उन्होंने कहा कि साधना करते हुए मिलने वाला सुख और अनुभव कृपा से आते हैं, और कृपा उसको मिलती है जो निरंतर प्रेम व श्रद्धा से साधना में लगा रहता है। प्राणायाम भी अगर सही तरीके से करें, तो मन तुरंत शांत हो जाता है, ठहराव में आ जाता है। अभ्यास करते हुए एक अच्छा अनुभव आपको हो जाए, तो जिंदगी बदल जाएगी। क्योंकि जो आनंद आपको साधना में मिलता है, उसके मुकाबले दुनिया की कोई चीज ठहर ही नहीं पाती। सूर्य की रोशनी, उसकी किरणों का आनंद लेना हो तो हमें घर के दरवाजे खोलकर बाहर खुले में जाना पड़ता है। ऐसे ही सद्गुरु या किसी संत का दर्शन करने का अर्थ है, अपने हृदय के द्वार खोल देना। जो दिल से साधक हो जाता है। वैराग्य इसलिए नहीं आता कि वह ईश्वर को ढूंढ रहा है, बल्कि इसलिए आता है कि उसको अपने अंदर ऐसा कुछ मिल जाता है, जिसके सामने दुनिया फीकी हो जाती है। भीतर के ईश्वरीय नजारे की तुलना में बाहर के दुनियावी नजारों की सुंदरता कुछ भी नहीं है।
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भक्ति मार्ग त्याग और बलिदान का मार्ग
विजयपुर/ सांबा। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की तरफ से रविवार को सत्संग का आयोजन किया गया। इस दौरान आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी सुचेतानंद ने संगत को ईश्वर भक्ति के मार्ग की दुर्लभता व महानता के बारे में बताया।
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उन्होंने बताया कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, और ईश्वर भक्ति करके ईश्वर को प्राप्त करना मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक ऐसा व्यक्ति जो काम है, क्रोधी है, लालची है, वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति एक साहसी और बहादुर व्यक्ति करता है। क्योंकि भक्ति मार्ग त्याग और बलिदान का मार्ग है। यह संघर्ष से परिपूर्ण रास्ता है, जिस पर विरले लोग ही चल पाते हैं। मानव जीवन में दूसरी अत्यंत दुर्लभता पूर्ण सतगुरु की शरण का मिलना है। क्योंकि एक सच्चा संत ही अंतर जगत के दर्शन कराने का सामर्थ्य रखता है, उसकी कृपा से ही संघर्ष से परिपूर्ण अत्यंत कठिन भक्ति मार्ग सरल हो जाता है। एक साधक अपनी मंजिल को प्राप्त कर पाता है।