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Jammu News: दो दशक पहले की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाईकोर्ट ने करीब दो दशक पहले एक सार्वजनिक उपक्रम से बर्खास्त किए गए कर्मचारी की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में उसने सेवा से हटाए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। साथ ही अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, प्राकृतिक न्याय के नियम शून्य में काम नहीं करते हैं ।
न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ मोहम्मद सादिक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा, याचिका में सादिक ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने वर्ष 2002 में नौकरी छोड़ दी थी और वर्ष 2015 तक दोबारा उसे ज्वाइन नहीं किया। 2017 में उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत पहली बार यह जानने के लिए आवेदन किया था। उनकी नौकरी की स्थिति क्या है?
अदालत ने सादिक की याचिका को खारिज करते हुए कहा, वह एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रेजिन और टर्पेन्टाइन फैक्ट्री फतेहपुर राजोरी में काम कर रहे थे, जो उनके अनुसार बाद में बंद हो गई थी और इसकी संपत्ति एमआरटीएफ, जम्मू में स्थानांतरित हो गई थी।
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अदालत ने कहा, भले ही प्रतिवादियों (अधिकारियों) ने याचिकाकर्ता (सादिक) की सेवा समाप्त करने से पहले कोई जांच नहीं की हो, लेकिन वर्तमान मामले में माना जाता है कि याचिकाकर्ता (सादिक) वर्षों तक अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं हुए, यह देखते हुए कि उनके द्वारा बताया गया कारण भ्रमपूर्ण और अस्पष्ट है। अगर जांच की भी जाती है तो कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा क्योंकि मौजूदा मामले में तथ्यों को स्वीकार कर लिया गया है।ॉ
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कोर्ट ने कहा-मेरिट के आधार पर भी मामला नहीं बनता
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, प्राकृतिक न्याय के नियम शून्य में काम नहीं करते हैं। एक बार जब तथ्य स्पष्ट हो जाएं और स्वीकार कर लिए जाएं, तो जांच कराना व्यर्थ होगा। मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता सादिक की दलीलों से यह सिद्ध हो गया है कि उसने अपनी सेवाएं छोड़ दी हैं। इसलिए मेरिट के आधार पर भी कोई मामला नहीं बनता।
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सादिक ने बिना सूचना कार्यालय आना कर दिया था बंद
इससे पहले अधिकारियों ने सादिक की याचिका का विरोध करते हुए दलील दी थी कि उन्होंने 2002 में अपनी सेवाएं छोड़ दी थीं और 2017 में यानी लगभग 15 साल बाद पहली बार अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सादिक 2002 से लगातार ड्यूटी से अनुपस्थित था और इस तरह उसने अपनी सेवा छोड़ दी थी। अधिकारियों ने कहा कि सादिक द्वारा अपने कार्यालय जाना बंद करने के बाद उन्होंने लगभग दो साल तक इंतजार किया और उसके ठिकाने का पता लगाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि एक बार जब उनके ठिकाने का पता नहीं चला तो सेवा से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
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हाईकोर्ट ने दो के खिलाफ पीएसए को खारिज किया
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने मंगलवार को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए)के तहत दो बंदियों की हिरासत के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही यह भी कहा कि किसी और मामले में आवश्यकता न होने पर इन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।
न्यायमूर्ति राजेश सेखरी की पीठ ने तारिक अहमद नापा के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट बारामुला द्वारा 15 सितंबर 2022 को पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान मामले में बंदी (नापा) को दी गई हिरासत के आधार हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा फील्ड एजेंसी से प्राप्त कुछ सामग्री या रिपोर्ट के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष मात्र हैं। इसलिए वर्तमान याचिका के आधार पर हिरासत के आदेश को रद्द किया जाता है।
इस बीच न्यायमूर्ति एमए चौधरी ने 27 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। इस आदेश में श्रीनगर के सुहैल अहमद शाह उर्फ साहिल को हिरासत में लेने और सेंट्रल जेल जम्मू में बंद करने का आदेश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा, साहिल को हिरासत में लेते समय सांविधानिक और वैधानिक रूप से उपलब्ध सुरक्षा उपायों का पालन करने में लापरवाही बरती गई। कोर्ट में संपूर्ण रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने कहा, हिरासत का आदेश अस्पष्ट आधारों पर आधारित है। इसके बाद, अदालत ने हिरासत आदेश को रद्द कर शाह को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
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न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ मोहम्मद सादिक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा, याचिका में सादिक ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने वर्ष 2002 में नौकरी छोड़ दी थी और वर्ष 2015 तक दोबारा उसे ज्वाइन नहीं किया। 2017 में उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत पहली बार यह जानने के लिए आवेदन किया था। उनकी नौकरी की स्थिति क्या है?
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अदालत ने सादिक की याचिका को खारिज करते हुए कहा, वह एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रेजिन और टर्पेन्टाइन फैक्ट्री फतेहपुर राजोरी में काम कर रहे थे, जो उनके अनुसार बाद में बंद हो गई थी और इसकी संपत्ति एमआरटीएफ, जम्मू में स्थानांतरित हो गई थी।
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अदालत ने कहा, भले ही प्रतिवादियों (अधिकारियों) ने याचिकाकर्ता (सादिक) की सेवा समाप्त करने से पहले कोई जांच नहीं की हो, लेकिन वर्तमान मामले में माना जाता है कि याचिकाकर्ता (सादिक) वर्षों तक अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं हुए, यह देखते हुए कि उनके द्वारा बताया गया कारण भ्रमपूर्ण और अस्पष्ट है। अगर जांच की भी जाती है तो कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा क्योंकि मौजूदा मामले में तथ्यों को स्वीकार कर लिया गया है।ॉ
कोर्ट ने कहा-मेरिट के आधार पर भी मामला नहीं बनता
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, प्राकृतिक न्याय के नियम शून्य में काम नहीं करते हैं। एक बार जब तथ्य स्पष्ट हो जाएं और स्वीकार कर लिए जाएं, तो जांच कराना व्यर्थ होगा। मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता सादिक की दलीलों से यह सिद्ध हो गया है कि उसने अपनी सेवाएं छोड़ दी हैं। इसलिए मेरिट के आधार पर भी कोई मामला नहीं बनता।
सादिक ने बिना सूचना कार्यालय आना कर दिया था बंद
इससे पहले अधिकारियों ने सादिक की याचिका का विरोध करते हुए दलील दी थी कि उन्होंने 2002 में अपनी सेवाएं छोड़ दी थीं और 2017 में यानी लगभग 15 साल बाद पहली बार अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सादिक 2002 से लगातार ड्यूटी से अनुपस्थित था और इस तरह उसने अपनी सेवा छोड़ दी थी। अधिकारियों ने कहा कि सादिक द्वारा अपने कार्यालय जाना बंद करने के बाद उन्होंने लगभग दो साल तक इंतजार किया और उसके ठिकाने का पता लगाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि एक बार जब उनके ठिकाने का पता नहीं चला तो सेवा से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
हाईकोर्ट ने दो के खिलाफ पीएसए को खारिज किया
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने मंगलवार को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए)के तहत दो बंदियों की हिरासत के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही यह भी कहा कि किसी और मामले में आवश्यकता न होने पर इन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।
न्यायमूर्ति राजेश सेखरी की पीठ ने तारिक अहमद नापा के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट बारामुला द्वारा 15 सितंबर 2022 को पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान मामले में बंदी (नापा) को दी गई हिरासत के आधार हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा फील्ड एजेंसी से प्राप्त कुछ सामग्री या रिपोर्ट के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष मात्र हैं। इसलिए वर्तमान याचिका के आधार पर हिरासत के आदेश को रद्द किया जाता है।
इस बीच न्यायमूर्ति एमए चौधरी ने 27 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। इस आदेश में श्रीनगर के सुहैल अहमद शाह उर्फ साहिल को हिरासत में लेने और सेंट्रल जेल जम्मू में बंद करने का आदेश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा, साहिल को हिरासत में लेते समय सांविधानिक और वैधानिक रूप से उपलब्ध सुरक्षा उपायों का पालन करने में लापरवाही बरती गई। कोर्ट में संपूर्ण रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने कहा, हिरासत का आदेश अस्पष्ट आधारों पर आधारित है। इसके बाद, अदालत ने हिरासत आदेश को रद्द कर शाह को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।