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सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तोड़मरोड़ कर पेश किया, सचिव-निदेशक तलब
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जम्मू। सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी स्टे ऑर्डर का हवाला देकर प्रदेश सरकार द्वारा जारी सर्कुलर पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने विधि विभाग के सचिव और निदेशक कॉलेज की ओर से जारी सर्कुलर को कोर्ट की अवमानना के परिप्रेक्ष्य में पाया है। हाईकोर्ट ने जवाब तलब करने के साथ ही दोनों अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्ति रूप से पेशी के आदेश दिए हैं। यह आदेश जस्टिस अली मोहम्मद मागरे ने अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया।
अवमानना याचिका की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फौजदारी और दीवानी मामलों में स्टेट ऑर्डर की मियाद का जिक्र केवल सीबीआई जांच संबंधी मामलों में किया था। सरकार की ओर से इसी आदेश को आधार बनाकर सभी प्रशासनिक सचिवों और विभागाध्यक्षों को सर्कुलर जारी कर कोर्ट आदेश को तोड़ मरोड़ कर पेश किया। इसमें कहा गया कि अंतरिम रोक संबंधी सभी मामलों की समीक्षा की जाए और अंतरिम रोक की अवधि को छह माह के बाद खत्म माना जाए। जस्टिस मागरे ने पाया कि 25 नवंबर 2020 को विधि, न्याय एवं संसदीय मामले विभाग के सचिव और 1 दिसंबर 2020 को उच्च शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है। अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल सीसीपी (एस) संख्या 395/2020 को लेकर आदेश दिया था। संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत संज्ञान में लिए गए मामले इस आदेश के दायरे में नहीं आते। लिहाजा दोनों अधिकारियों से जवाब तलब किया जाता है। जवाब के साथ दोनों अधिकारियों को खुद भी कोर्ट में पेश होना होगा।
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अवमानना याचिका की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फौजदारी और दीवानी मामलों में स्टेट ऑर्डर की मियाद का जिक्र केवल सीबीआई जांच संबंधी मामलों में किया था। सरकार की ओर से इसी आदेश को आधार बनाकर सभी प्रशासनिक सचिवों और विभागाध्यक्षों को सर्कुलर जारी कर कोर्ट आदेश को तोड़ मरोड़ कर पेश किया। इसमें कहा गया कि अंतरिम रोक संबंधी सभी मामलों की समीक्षा की जाए और अंतरिम रोक की अवधि को छह माह के बाद खत्म माना जाए। जस्टिस मागरे ने पाया कि 25 नवंबर 2020 को विधि, न्याय एवं संसदीय मामले विभाग के सचिव और 1 दिसंबर 2020 को उच्च शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है। अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल सीसीपी (एस) संख्या 395/2020 को लेकर आदेश दिया था। संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत संज्ञान में लिए गए मामले इस आदेश के दायरे में नहीं आते। लिहाजा दोनों अधिकारियों से जवाब तलब किया जाता है। जवाब के साथ दोनों अधिकारियों को खुद भी कोर्ट में पेश होना होगा।
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