J&K: शादी का झांसा देकर बने रिश्ते पर गुजारा भत्ता नहीं दिला सकती अदालत, हाईकोर्ट ने खारिज की महिला की अर्जी
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि शादी का झांसा देकर बने रिश्ते को वैध विवाह नहीं माना जा सकता और ऐसे मामले में महिला को गुजारा भत्ता नहीं मिल सकता। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जमानत और अग्रिम जमानत अर्जियां दो महीने के भीतर निपटाई जाएं।
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि शादी का झांसा देकर बने रिश्ते को पति-पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता और ऐसे मामले में महिला अपने साथी से गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती।अदालत ने यह भी साफ किया कि दुष्कर्म का दोषी करार दिया गया व्यक्ति पीड़िता का पति नहीं माना जा सकता और न ही उस पर पत्नी जैसा दायित्व डाला जा सकता है।
मामला कठुआ जिले का है। एक महिला ने अपने साथी पर शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। महिला का कहना था कि दोनों करीब दस साल तक साथ रहे और 2016 में उनके यहां बच्चा भी हुआ।
साथी के विवाह से साफ इन्कार किया तो उसने दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया। अदालत ने सुनवाई के बाद पुरुष को दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत सजा सुनाई। इसके बाद महिला ने अदालत में गुजारा भत्ता की अर्जी दाखिल की। उसका कहना था कि इतने लंबे समय तक साथ रहने और बच्चा होने के कारण उसे पत्नी माना जाए और उसे गुजारा भत्ता दिया जाए।
इस पर ट्रायल मजिस्ट्रेट ने महिला की दलील को मानते हुए उसे अंतरिम भत्ता देने का आदेश दिया। कठुआ के प्रधान सत्र न्यायाधीश ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि महिला और पुरुष का कानूनी विवाह नहीं हुआ था।
गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। महिला ने सत्र अदालत के फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी उसकी अर्जी खारिज कर दी। न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल ने कहा कि जब किसी पुरुष को महिला की ही शिकायत पर
दुष्क्रम का दोषी ठहराया जा चुका है तो दोनों को पति-पत्नी मानना न्यायसंगत नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि यदि रिश्ते को पति-पत्नी जैसा माना जाए तो दुष्कर्म का अपराध बनता
ही नहीं।
अदालत ने यह जरूर स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण–पोषण के लिए मिलने वाला खर्च पहले की तरह मिलता रहेगा। यानी महिला को व्यक्तिगत रूप से भत्ता नहीं मिलेगा। बच्चे की देखरेख की जिम्मेदारी पिता पर बनी रहेगी।
न्यायालय बोला- दुष्कर्म के दोषी को पत्नी जैसा दायित्व नहीं दिया जा सकता
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सभी निचली अदालतों और अपनी दोनों खंडपीठों में लंबित जमानत अर्जियों की त्वरित सुनवाई को लेकर सख्त कदम उठाए हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि जमानत और अग्रिम जमानत की अर्जी दो महीने के भीतर निपटाई जानी चाहिए। सिवाय उन मामलों के जहां देरी की जिम्मेदारी पक्षकारों की हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाईकोर्ट ने यह कदम उठाया है।
हाईकोर्ट रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जारी सर्कुलर में कहा गया है कि ऐसे मामले सीधे नागरिकों की आजादी और मौलिक अधिकारों से जुड़े होते हैं। लिहाजा अनिश्चितकाल तक टाले जाने की प्रवृत्ति अब बर्दाश्त नहीं होगी।
इसके बाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल न्यायिक ने आदेश जारी कर जम्मू विंग में लंबित जमानत अर्जियों को अलग-अलग पीठों को बांट दिया है। न्यायमूर्ति संजय धर, न्यायमूर्ति मोहद अकरम चौधरी, न्यायमूर्ति संजय परिहार और न्यायमूर्ति शहजाद अजीम को इनके लिए नामित किया गया है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि 27 सितंबर के बाद दायर होने वाली नई जमानत अर्जियों को प्राथमिकता दी जाएगी और इनकी सुनवाई नियमित रूप से की जाएगी।