आमदनी और खर्च की खाई पाटने का बंदोबस्त नहीं
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अर्थशास्त्री वित्त मंत्री डा. हसीब द्राबू ने गंभीर वित्तीय संकट के दौर में संतुलित बजट पेश करने की बाजीगरी तो दिखाई है लेकिन बजट घाटा उनके गणित को गड़बड़ा सकता है। सात साल की परंपरा को तोड़ते हुए द्राबू ने घाटे का बजट पेश कर इसे धरातल की सच्चाई से जोड़ा। साफगोई की सराहना तो की जा सकती है लेकिन 4336 करोड़ रुपये कहां से आएंगे? इस पर बजट मौन है।
वित्त मंत्री के समक्ष विरासत में मिले खाली खजाने को ढ़ोने की मजबूरी के साथ अपने कौशल से उसे भरने की चुनौती भी है। उन्हें 3649 करोड़ की देनदारी मिली है। द्राबू को लगभग 8 हजार करोड़ के ऋणात्मक खाते से शुरुआत करनी पड़ी है।
इन हालात में भी वित्त मंत्री ने केंद्र के सामने भीख नहीं मांगने के ऐलान का साहस दिखाया। यह आत्मविश्वास वह केंद्र से रियासत के हिस्से को समय पर हासिल करने के कौशल के बूते जता पाए हैं। द्राबू ने कहा कि संघीय ढ़ांचे में रियासत का जितना हिस्सा बनता है, हम उसी से गुजारा कर लेंगे।
द्राबू ने जेटली को भी लगाया मस्का
दरअसल अब तक रियासत सरकार योजनाओं का डीपीआर समय पर भेजने में विफल रही है। उपयोगिता प्रमाण पत्र भी समय पर नहीं भेजा जा सका। नतीजतन स्वीकृत आवंटन लटकता रहा। द्राबू इन कमियों को समाप्त कर फंड का प्रवाह बढ़ाना चाहते हैं। महज 14 दिन में बनाए गए बजट में द्राबू ने निजी क्षेत्र पर ज्यादा भरोसा दिखाया।
वह मानते हैं कि सरकारी नौकरियों का आकर्षण घटाकर निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने का माहौल बनाना जरूरी है। हौसले की सराहना की जा सकती है, पर यह नहीं भूलना होगा कि कुल बजट का 44 फीसदी हिस्सा अब भी केंद्रीय अनुदान पर टिका है। केंद्रीय करों का 19 प्रतिशत जोड़ दिया जाए तो 63 प्रतिशत राशि केंद्र से ही आएगी।
द्राबू इसे समझते हैं। इसीलिए उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री जेटली को संवेदनशील बताते हुए जम्मू कश्मीर के हालात बखूबी समझने वाला नेता बताया। नई प्रशासनिक इकाइयों के ढांचे को खड़ा कर कार्यशील बनाने के लिए 1700 करोड़ की जरुरत है। बजट में इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
नागपुर से हर शाम आता है फोन
उमर सरकार ने चुनाव से ऐन पहले नई प्रशासनिक इकाइयां तो बनाईं लेकिन बजट में सिर्फ 5 करोड़ का प्रावधान किया था। बाद में दूसरे मद की राशि इसमें खर्च की गई। इससे वित्तीय अनुशासन डगमगाया। सियासी कारणों से मुफ्ती सरकार नई इकताइयां खत्म करने का जोखिम नहीं उठा सकती लेकिन संचालन के लिए राशि नहीं होने पर आर्थिक दिक्कतें बनी रहेंगी।
वेतन, पेंशन मद में कुल बजट का 41 प्रतिशत खर्च होने पर अंकुश संभव नहीं है। नतीजतन द्राबू का पूरा साल धन जुटाने की जद्दोजहद में ही गुजरने वाला है।
विपक्ष का आरोप है कि मुफ्ती सरकार नागपुर के रिमोट से चल रही है। वित्त मंत्री ड. हसीब द्राबू कहते हैं कि नागपुर से हर शाम फोन तो आता है लेकिन वह आरएसएस मुख्यालय से नहीं बल्कि वह रिजर्व बैक आफ इंडिया के मानिटरिंग सेल का फोन होता है। इस फोन के बाद वित्त सचिव की चिंताएं बढ़ जाती हैं।