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सिनटैक्स की टंकी और पलेटों की पतवार ने लगाया पार

Sun, 14 Sep 2014 01:36 AM IST
Updated Sun, 14 Sep 2014 01:36 AM IST
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boat made of sintex tank saved our life said tourist

चारों तरफ पानी ही पानी... तैर कर भी कितना पार कर जाते... नाव थी नहीं... ऊपर से तीन दिनों से कुछ खाया भी नहीं था। जब हौसले पस्त होने लगे तो जान बचाने के लिए बेटे ने पानी की सिनटैक्स की टंकी को काटकर उसको नाव बनाया और स्टील की प्लेटों की पतवार बनाई और किसी तरह से शिवपोरा पहुंचकर सेना को हम तक पहुंचाया।

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जम्मू की चुनी सुलतान जब आपबीती बयां कर रही थी तो उसकी आंखों में आंसुओं का जो सैलाब उमड़ रहा था, वह किसी बाढ़ से कम नहीं था। 67 वर्षीय चुनी और 72 वर्षीय बिमला भान ने जिंदगी के इतने वर्षों में बाढ़ का ऐसा भयावह मंजर नहीं देखा। हवाई जहाज से जम्मू टेक्निकल एयरपोर्ट पर उतरते ही बिमला से बात करने के लिए जैसे ही कदम आगे बढ़ाए तो उसने झपटकर गले लगाते हुए कहा, बेटा मुझे पहले पानी पिला दो।
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श्रीनगर से सही सलामत लौटे इस परिवार में सरकार को लेकर काफी रोष है। दो टूक शब्दों में कहते हैं, कहां है सरकार। हमारे लिए जो किया सेना ने किया। जो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने में कहीं नहीं दिखे।

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जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी हमने

boat made of sintex tank saved our life said tourist

श्रीनगर में आई बाढ़ ने लोगों को जद्दोजहद करने पर मजबूर कर दिया। किसी को रहने के लिए छत नसीब नहीं हुई तो कई दाने-दाने को तरस गए। बाढ़ में फंसे लोगों को खाली पेट ही रातें भी गुजारनी पड़ी। शुक्रवार को कई लोग जब अपने घर वापस पहुंचे तो उनका हाल-चाल जानने के लिए लोगों का तांता लग गया।

चिनैनी के कुलदीप सिंह और उनका बेटा श्रीनगर गए हुए थे। कुलदीप सिंह ने कहा कि छह सितंबर को श्रीनगर में पानी घरों में घुसने लगा और वह किसी सुरक्षित स्थान पर मुश्किल से पहुंचे। बावजूद उसके दिक्कतें कम नहीं हुई। भूख-प्यास का पता तो नहीं था। कभी बिस्कुट मिल जाता तो कई बार रातें खाली पेट ही गुजारी।

'कभी खाना मिलता तो वह भी भर पेट नहीं'

boat made of sintex tank saved our life said tourist

एक समय ऐसा भी आया कि उन्होंने जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। उन्होंने कहा कि फौज व सुरक्षा बल तथा कश्मीर के बटालियन का उन्हें काफी सहयोग मिला। उधर, हाजियों को छोड़ने लाइजन आफिसर के तौर पर श्रीनगर गए नायब तहसीलदार रफीक अहमद कंठ ने कहा कि बाढ़ का मंजर देख रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि खाने-पीने के लिए एक सप्ताह का दौर काफी मुश्किल से गुजरा। कभी खाना मिलता तो वह भी भर पेट नहीं। उन्होंने कहा कि उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचने के लिए गांदरबल, मानसबल, सफाकदल, उड़ी, बांडीपोरा, सोपोर और अन्य जगह से करीब तीन सौ किलोमीटर का सफर कर पहुंचना पड़ा। वहीं मो. लतीफ, कृष्ण पाल चंद को भी इसी तरह की समस्या को पार करना पड़ा।

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