झेलम के दो किनारे क्या मिलेंगे कभी?
- कश्मीर में एक चुनी हुई सरकार की ग़ैरहाज़िरी लोगों को खल रही थी। लग रहा था लोकतंत्र के बग़ैर कश्मीर अनाथ हो गया है।
- लोकतंत्र की ये ग़ैरहाज़िरी तीन महीने से कम की थी। जम्मू कश्मीर में तो सालों तक लोकतंत्र ग़ैरहाज़िर रहा है।
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पिछले साल विधानसभा चुनाव के बाद विपरीत विचारधारा वाली इन दोनों पार्टियों का मिलकर सरकार बनाना एक नया प्रयोग था, जो लड़खड़ाते, घिसटते हुए किसी तरह चला।
मगर मुफ़्ती मुहम्मद सईद की मौत के बाद ये प्रयोग नाकाम होता दिखाई दिया। दोनों पार्टियों ने एक बार फिर सत्ता की बागडोर संभाली है। ये जितना वक़्त की ज़रूरत थी, उतनी ही दोनों की सियासी मजबूरी।
लोकतंत्र के बग़ैर कश्मीर अनाथ हो गया है
कश्मीर के अपने हालिया दौरे के दौरान लोकतंत्र पर मेरा विश्वास थोड़ा और ठोस हुआ है। मैं कभी किसी ऐसे राज्य में नहीं रहा हूँ, जहाँ जनता के ज़रिए चुनी सरकार न हो। कश्मीर में एक चुनी हुई सरकार की ग़ैरहाज़िरी लोगों को खल रही थी। लग रहा था लोकतंत्र के बग़ैर कश्मीर अनाथ हो गया है।
राज्य में महबूबा मुफ़्ती की ताजपोशी के बाद लोगों की उम्मीदें और आशाएं फिर जाग जाएंगी। हालांकि लोकतंत्र की ये ग़ैरहाज़िरी तीन महीने से कम की थी। जम्मू कश्मीर में तो सालों तक लोकतंत्र ग़ैरहाज़िर रहा है।
इसके बावजूद मुझे लगा कि इस बार लोकतंत्र के अभाव से कश्मीरी पीड़ित थे। बाढ़ ने वहां कारोबार की कमर तोड़ दी है। दुकानें खुली हैं पर ग्राहक ग़ायब। मुझसे कई पीड़ित लोगों ने शिकायत की कि बाढ़ के मुआवज़े की रक़म बहुत कम है। कई को मुआवज़े अब तक नहीं मिले हैं।
साथ ही आम जनता की प्रशासन तक पहुँच सीमित हो गई थी। मतभेद और असहमति की आवाज़ें दबकर रह गई थीं। सियासी सरगर्मियां थम गई थीं।
पिछले कुछ महीनों में चरमपंथी हमलों में इज़ाफ़ा हुआ है
घाटी में युवाओं के बीच कट्टरता की प्रक्रिया सरकार बनने से पहले से ही ज़ोर पकड़ रही थी। महबूबा मुफ़्ती की सत्ता संभालने में हिचकिचाहट से रेडिकलाज़ेशन में और तेज़ी आई है। युवा हथियार उठाने लगे हैं।
पिछले कुछ महीनों में चरमपंथी हमलों में इज़ाफ़ा हुआ है। मिलिटेंट्स के जनाज़ों में आम लोग हज़ारों की संख्या में शामिल हो रहे हैं। कश्मीर के उर्दू अख़बार चट्टान के संपादक ताहिर मोहिउद्दीन के अनुसार युवाओं में कुंठा और निराशा बढ़ी है, जिसका इज़हार वो इन जनाज़ों में शामिल होकर करते हैं।
पहले क़दम के तौर पर सरकार बहाली को सराहना चाहिए लेकिन क्या चुनी हुई सरकार की बहाली कश्मीर में स्थिरता लाने में कामयाब होगी? कश्मीर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गुल मुहम्मद वानी कहते हैं केवल सरकार का सत्ता में वापस आना काफ़ी नहीं होगा। सरकार का मज़बूती से चलना और राजनीतिक स्थिरता बहाल करना सबसे ज़रूरी है।
सरकार से निराशा दूर करना बड़ी चुनौती होगी
पिछले चुनाव में कश्मीर घाटी में पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी जबकि जम्मू में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन किसी एक पार्टी को साफ़ बहुमत न मिलने से पीडीपी और बीजेपी को आपस में हाथ मिलाना पड़ा था।
मुझे कई लोगों ने बताया कि पीडीपी के इस क़दम से कश्मीरी मुस्लिम पार्टी से काफ़ी नाराज़ हैं। एक युवती ने पीडीपी को वोट दिया था। जब पार्टी ने बीजेपी से हाथ मिलाया, तो उसे लगा पार्टी ने उसके साथ विश्वासघात किया है। यही सोच कश्मीरी मुसलमानों में आम थी।
महबूबा मुफ़्ती को उनका विश्वास दोबारा हासिल करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में एक होगी। आम लोगों में सरकार से निराशा दूर करना उनकी दूसरी बड़ी चुनौती होगी।
कश्मीर एक बार फिर चरमपंथ की वापसी के दहाने पर खड़ा है
प्रोफ़ेसर वानी कहते हैं कश्मीर एक बार फिर चरमपंथ की वापसी के दहाने पर खड़ा है। महबूबा मुफ़्ती को हर हाल में इस सूरतेहाल को बदलना होगा। इसके लिए उन्हें केंद्र की मदद की ज़रूरत होगी। भाजपा सत्ता में पार्टनर की हैसयत से सहयोगी साबित हो सकती है।
पीडीपी और बीजेपी भले ही झेलम के दो ऐसे किनारे हैं, जो कभी नहीं मिलते, लेकिन दोनों साथ झेलम का पानी तो पी सकते हैं।