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माता-पिता की खुशी में ही संतान की खुशी: सुरेश शर्मा
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गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में कथावाचक ने बताया माता-पिता का महत्व
संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। गांव चन्नी टरगवाल में चल रहे 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में सोमवार को कथावाचक सुरेश शास्त्री ने कहा कि माता-पिता की सेवा में ही सबसे बड़ी भक्ति है। माता-पिता का आभार हम कभी भी नहीं चुका सकते। उनकी खुशी में ही संतान की खुशी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि माता-पिता संतान की खुशी के लिए दिन-रात एक कर मेहनत करते हैं, और पाल कर बड़ा करते हैं। मां खुद गीले बिस्तर पर सोकर संतान को सूखी जगह पर सुलाती है। इसलिए, माता-पिता की सेवा करने से ही कई संकट नजदीक नहीं आते। उन्होंने कहा कि मास और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके सेवन से दिमाग के सोचने की गति में कमी आती है। हमें आपस में प्रेम से रहना चहिए। कभी अपने बच्चों के सामने किसी के साथ भेदभाव की बातें नहीं करनी चाहिए। क्योंकि, बच्चे वहीं बातें ध्यान में भर लेते हैं और खुद भी उसी राह पर चल पड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि कुदरत के बनाए हर प्राणी से प्रेम करना चाहिए। कहा भी गया है कि प्रेम ईश्वर है, और ईश्वर प्रेम। जहां प्रेम है वहां प्रभु उपस्थित हैं। इसमें संदेह नहीं कि अधिक से अधिक प्राणियों से प्रेम करें। प्रेम को सेवा में रूपांतरित कर दें और सेवा को पूजा में। यह सर्वश्रेष्ठ साधना है। उन्होंने कहा कि प्रभु से प्रेम आप तभी कर पाएंगे जब आप प्रभु निर्मित हर चीज से प्रेम करेंगे। प्रभु की कृपा से बढ़कर कोई अन्य दौलत नहीं। यह आपकी वैसे ही रक्षा करती है, जैसे पलकें आखों की। इस आस्था के प्रति तनिक भी अविश्वास न करें। यह जीवन की सांसों की तरह प्रामाणिक है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। गांव चन्नी टरगवाल में चल रहे 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में सोमवार को कथावाचक सुरेश शास्त्री ने कहा कि माता-पिता की सेवा में ही सबसे बड़ी भक्ति है। माता-पिता का आभार हम कभी भी नहीं चुका सकते। उनकी खुशी में ही संतान की खुशी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि माता-पिता संतान की खुशी के लिए दिन-रात एक कर मेहनत करते हैं, और पाल कर बड़ा करते हैं। मां खुद गीले बिस्तर पर सोकर संतान को सूखी जगह पर सुलाती है। इसलिए, माता-पिता की सेवा करने से ही कई संकट नजदीक नहीं आते। उन्होंने कहा कि मास और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके सेवन से दिमाग के सोचने की गति में कमी आती है। हमें आपस में प्रेम से रहना चहिए। कभी अपने बच्चों के सामने किसी के साथ भेदभाव की बातें नहीं करनी चाहिए। क्योंकि, बच्चे वहीं बातें ध्यान में भर लेते हैं और खुद भी उसी राह पर चल पड़ते हैं।
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उन्होंने कहा कि कुदरत के बनाए हर प्राणी से प्रेम करना चाहिए। कहा भी गया है कि प्रेम ईश्वर है, और ईश्वर प्रेम। जहां प्रेम है वहां प्रभु उपस्थित हैं। इसमें संदेह नहीं कि अधिक से अधिक प्राणियों से प्रेम करें। प्रेम को सेवा में रूपांतरित कर दें और सेवा को पूजा में। यह सर्वश्रेष्ठ साधना है। उन्होंने कहा कि प्रभु से प्रेम आप तभी कर पाएंगे जब आप प्रभु निर्मित हर चीज से प्रेम करेंगे। प्रभु की कृपा से बढ़कर कोई अन्य दौलत नहीं। यह आपकी वैसे ही रक्षा करती है, जैसे पलकें आखों की। इस आस्था के प्रति तनिक भी अविश्वास न करें। यह जीवन की सांसों की तरह प्रामाणिक है।
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