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एलओसी पर कभी नहीं सोते जवान

Fri, 11 Mar 2016 12:34 PM IST
भूपेंदर सिंह भाटिया, अमर उजाला/जम्मू
भूपेंदर सिंह भाटिया, अमर उजाला/जम्मू Updated Fri, 11 Mar 2016 12:34 PM IST
सार

  • कई लोकेशन पर दुश्मन से 50 मीटर की दूरी पर जवान की ड्यूटी होगी, इसलिए वह सोता नहीं है। 
  • 6 आरआर के कमांडर प्रशांत कहते हैं कि एक समय था जब इस इलाके में लोग अंधेरा होते ही घरों में दुबक जाते थे। 

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army solider never sleep on LOC
भारत पाक‌िस्तान सीमा पर तैनात भारतीय जवान - फोटो : PTI

विस्तार

अग्रिम पंक्ति में तैनात होने वाले जवान एलओसी पर कभी नहीं सोते। कोर बैटल स्कूल के प्रशिक्षकों की मानें तो जवानों को 28 दिनों के प्रशिक्षण के दौरान फारवर्ड डिफेंडेड लोकेशन के लिए विशेष रूप से तैयार किया जाता है। 

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कई लोकेशन पर दुश्मन से 50 मीटर की दूरी पर जवान की ड्यूटी होगी, इसलिए वह सोता नहीं है। भले ही वह किसी भी परिस्थिति में तैनात हो। उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से तैयार किया जाता है।
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कभी आतंकियों का गढ़ माने जाने वाले सूरनकोट और आसपास के क्षेत्र से अब आतंकी भागने  को मजबूर हैं। 6 आरआर के कमांडर प्रशांत कहते हैं कि एक समय था जब इस इलाके में लोग अंधेरा होते ही घरों में दुबक जाते थे। 
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एलओसी से मुगल रोड होते कश्मीर घाटी जाने वाले आतंकियों का रास्ता सूरनकोट होकर ही गुजरता है और यहां आतंकियों का दबदबा था, लेकिन सेना की कार्रवाई के बाद आतंकी हथियार छोड़ भूमिगत हो गए हैं। 

हालांकि सेना इसे कभी हल्के में नहीं लेती, क्योंकि जब भी सेना यहां से पीछे हटेगी, आतंकी तत्काल सक्रिय हो जाएंगे। इसलिए सेना आज भी उसी तरह सक्रिय है, जैसे 2-3 साल पहले थी। प्रशांत कहते हैं कि सेना ने इस क्षेत्र के विकास के लिए काफी कुछ किया है। यही कारण है कि इलाके के लोग सेना के साथ जुड़े हुए हैं।

आतंकियों पर पैनी नजर रखता है लोरस

army solider never sleep on LOC
एलसओसी पर गश्त करते भारतीय जवान - फोटो : PTI

लाइन आफ कंट्रोल से। रात के अंधेरे में एलओसी फांद कर आने वाले आतंकियों पर जहां इंसानी नजर नहीं पहुंच पाती, वहां लांग रेंज रेकी एंड आब्जर्वेटिंग सिस्टम (लोरस) आतंकियों पर पैनी नजर रखता है। इस्रायली तकनीक वाली यह प्रणाली रात के समय आठ और दिन के समय सोलह किलोमीटर दूर तक आतंकी गतिविधियों को कैद करती है। 

हालांकि इस्रायली तकनीक काफी महंगी है, लेकिन इसे एलओसी के तमाम प्रमुख स्थलों पर लगाया गया है। एलओसी के पास स्थित कोर बैटल स्कूल के प्रशिक्षक लेफ्टिनेंट कर्नल वीरेंद्र बताते हैं कि इस सिस्टम के तहत आतंकियों की संदिग्ध गतिविधियों को देखने के बाद नियंत्रण रेखा के पास तैनात जवानों को कंट्रोल रूम से दिशा-निर्देश दिए जाते हैं और आतंकियों को फेंसिंग के पास आने का मौका दिया जाता है। 

उसके बाद उन्हें हर ओर से घेर कर हमला कर दिया जाता है। हालांकि उनका कहना है कि लोरस के जरिये आतंकियों की पहचान करने के बाद उन्हें आटोमैटिक हथियारों से कंप्यूटर से टारगेट बनाने की तकनीक अभी देश में नहीं आई है, लेकिन लोरस से पता लगने के बाद हमारे जवान हैंड हेल्ड थर्मल इमेजर्स (एचएचटीआई) की मदद से उन तक पहुंचने में कामयाब होते हैं। इसी कारण सेना को घुसपैठ रोकने में काफी मदद मिली है।

सैन्य अधिकारियों के अनुसार एलओसी पर तैनात होने वाले सैनिकों को कोर बैटल स्कूल में इस तकनीक से परिपक्व किया जाता है, ताकि वे एलओसी पर किसी तरह से कमजोर न हों। 

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