BJP ने PDP से समझौते का दस्तावेज हटाया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन को लेकर सब कुछ ठीक होने के भले ही तमाम दावे कर रही हो, लेकिन मौजूदा हालात में दोनो पार्टियों में सब कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा।
ताजा घटना क्रम में गठबंधन के दौरान तय एजेंडा ऑफ एलायंस भाजपा की वेबसाइट से गायब नजर आ रहा है। दरअसल भाजपा और पीडीपी ने अपनी-अपनी शर्तें एक दूसरे के सामने रखकर गठबंधन किया था।
इन शर्तों के लिए एक दस्तावेज तैयार किया गया था, जिसे एजेंडा ऑफ एलायंस नाम दिया गया था। मार्च 2015 में राज्य के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के बीच बातचीत के बाद इस पेश किया गया था।
पीडीपी की वेबसाइट पर दिख रहा एजेंडा ऑफ एलायंस
ये दस्तावेज पीडीपी की वेबसाइट www.jkbjp.in पर तो नजर आ रहा है, लेकिन भाजपा की वेबसाइट से दस्तावेज गायब है। वहीं पूरे मामले में भाजपा नेताओं का कहना है कि एजेंडा ऑफ एलायंस पार्टी की बेवसाइट से नहीं हटाया गया है, वो वहीं पर है।
अगर कोई उसे देखना चाहता है तो वो उसे दे सकते हैं। वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के एक महीने बाद भी सरकार गठन के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती कई मुद्दों पर भाजपा और केंद्र सरकार से ठोस आश्वासन चाहती हैं, तो वहीं धीरे-धीरे पीडीपी की शर्तें भाजपा के गले की फांस बनती नजर आ रही है।
अपना वोट बैंक बचाने की कोशिश कर रहीं महबूबा
सूत्रों की माने तो महबूबा मुफ्ती बिना ट्रायल के लंबे समय से जेल में बंद लोगों की रिहाई चाहती है, इसके साथ धारा 370, अफस्पा जैसे मुद्दों पर भी दोनों पार्टियों में सहमति नहीं बन पा रही है। मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद महबूबा को अपने जनाधार का किला ढहता नजर आ रहा है।
अनंतनाग और बिजबिहेड़ा जैसे दुर्ग में अवाम भाजपा से गठबंधन के खिलाफ रही है। पीडीपी मानती है कि 10 महीने के शासनकाल में गठबंधन एजेंडे के तमाम बिन्दुओं पर कुछ काम नहीं हो पाया। इसलिए अब नए सिरे से कुछ हासिल करने की कोशिश हो रही है।
वहीं सरकार गठन में हो रही देरी पर अब सरकार गठन के अन्य पहलुओं पर भी विचार विमर्श शुरू हो गया है। सूत्रों की माने तो भाजपा को सरकार गठन का न्यौता देने के लिए कानूनी राय ली जा रही है। फिलहाल मौजूदा परिस्थितों को देखकर ऐसा लगता है कि अभी रियासत के लोगों को नई सरकार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा।