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Jammu News: झूठे केस में फंसे सिपाही को 18 साल बाद मिला इंसाफ
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जम्मू। झूठे केस में फंसाए गए जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सिपाही को 18 साल बाद केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) से न्याय मिला है। कैट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब अदालत और विभागीय जांच दोनों में सिपाही को निर्दोष पाया गया तो उसकी पदोन्नति से इनकार करना न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि कर्मचारी के साथ अन्याय भी है। कैट ने विभागीय आदेश को रद्द करते हुए सिपाही को 28 दिसंबर 2006 से सभी सेवा लाभों के साथ पदोन्नति देने का आदेश दिया।
मामला कठुआ जिले के निवासी करन सिंह का है। करन सिंह 24 अप्रैल 1995 को जम्मू-कश्मीर पुलिस की दूसरी बटालियन में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुए थे। छह दिसंबर 2004 को उनके खिलाफ कठुआ में एक झगड़े के मामले में एफआईआर दर्ज की गई। मामला अदालत में चला और 30 जनवरी 2014 को अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
बरी होने के बाद भी विभाग ने भी आंतरिक जांच शुरू की। इसमें भी करन सिंह निर्दोष पाए गए। इसके बावजूद, विभाग ने 28 मई 2014 को एक पत्र जारी कर कहा कि करन सिंह को अदालत से ''''संदेह का लाभ'''' मिलने के आधार पर छोड़ा गया है, इसलिए उन्हें पिछली तारीख से पदोन्नति नहीं दी जा सकती।
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बाद में विभाग ने 23 जुलाई 2014 को उन्हें पदोन्नत कर दिया, लेकिन यह प्रमोशन 2006 से उनके बैच के अन्य सिपाहियों की तरह प्रभावी नहीं हुआ। करन सिंह को आठ साल की वरिष्ठता और वेतन बढ़ोतरी से वंचित रखा गया। इसके खिलाफ उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसे बाद में कैट को स्थानांतरित कर दिया गया।
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मामला कठुआ जिले के निवासी करन सिंह का है। करन सिंह 24 अप्रैल 1995 को जम्मू-कश्मीर पुलिस की दूसरी बटालियन में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुए थे। छह दिसंबर 2004 को उनके खिलाफ कठुआ में एक झगड़े के मामले में एफआईआर दर्ज की गई। मामला अदालत में चला और 30 जनवरी 2014 को अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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बरी होने के बाद भी विभाग ने भी आंतरिक जांच शुरू की। इसमें भी करन सिंह निर्दोष पाए गए। इसके बावजूद, विभाग ने 28 मई 2014 को एक पत्र जारी कर कहा कि करन सिंह को अदालत से ''''संदेह का लाभ'''' मिलने के आधार पर छोड़ा गया है, इसलिए उन्हें पिछली तारीख से पदोन्नति नहीं दी जा सकती।
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बाद में विभाग ने 23 जुलाई 2014 को उन्हें पदोन्नत कर दिया, लेकिन यह प्रमोशन 2006 से उनके बैच के अन्य सिपाहियों की तरह प्रभावी नहीं हुआ। करन सिंह को आठ साल की वरिष्ठता और वेतन बढ़ोतरी से वंचित रखा गया। इसके खिलाफ उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसे बाद में कैट को स्थानांतरित कर दिया गया।