1947 विलय की कहानी...देश मना रहा था स्वतंत्रता की खुशियां, जल रहा था जम्मू-कश्मीर, पढ़ें खास रिपोर्ट
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विलय की कहानी, बोधराज की जुबानी...
14 अगस्त 1947 की रात जब भारत स्वतंत्र होने की खुशियां मना रहा था, तब जम्मू-कश्मीर में अफरा-तफरी का माहौल था। विलय के समय मैं जम्मू व कश्मीर राइफल्स में था। साथ ही महाराजा हरि सिंह के अंगरक्षक के तौर पर मौजूद था। महाराजा उस समय बहुत दुविधा में थे। फौज की भी बहुत कमी थी। महाराजा की फौज में सिर्फ सात लड़ाकू पलटन, एक घुड़सवार रसाला व एक ट्रेनिंग सेंटर था। इतने बड़े इलाके को इतनी कम फौज संभालने में सक्षम नहीं थी। लेकिन महाराजा के कुछ खास सलाहकार उनको गलत सलाह दे रहे थे। वह कह रहे थे कि आप बेफिक्र रहें, हमारी फौज पाकिस्तान के हमले की स्थिति में पूरी तरह मुकाबला करेगी और दुश्मन को वापस खदेड़ देगी। इसीलिए महाराजा जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य रखने की जिद पर अडे़ हुए थे।
जम्मू-कश्मीर की फौजों का बंटवारा भी अंदर-अंदर चल रहा था, जिसकी महाराजा को सही जानकारी ही नहीं थी। स्टैंड स्टिल (जैसे हैं वैसे रहेंगे) की स्थिति को बहाल करने के लिए महाराजा भारत व पाकिस्तान के साथ बातचीत कर रहे थे। इसी बीच अभी के पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के इलाकों में जो फौज थी, धीरे-धीरे परास्त हो रही थी। 7 नंबर पलटन लगभग समाप्त हो चुकी थी। बचे सैनिक जिनमें प्रमुख थे, कमांडर ब्रिगेडियर घनसारा सिंह व कर्नल बलदेव सिंह बाजवा युद्धबंदी बना लिए गए थे। उधर, पलटन नंबर 3 मीरपुर में थी, जिसके ज्यादातर सैनिक शहीद हो गए थे और बाकी बचे जम्मू की तरफ वापस भाग कर आ रहे थे।
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मच्छरदानी के डंडे से ट्रेनिंग देने पर थे मजबूर
4 नंबर पलटन उरी कोहला में थी, जो पहले ही पाकिस्तान के साथ मिल चुकी थी और उनके कर्नल नारायण सिंह की वहां हत्या करवा दी गई थी। एक और पलटन (नंबर 1) जो अपनी बहादुरी के कारण रघु प्रताप के नाम से प्रसिद्ध थी, पुंछ, बाघ व पुलनदरी इलाके में थी, बड़ी बहादुरी से लड़ रही थी। लेकिन जम्मू से संपर्क टूटने के कारण वो भी अंत में हार गई। लेकिन इस पलटन ने अपने सूझबूझ रखने वाले अफसरों ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह, कर्नल हीरा नंद व कर्नल खजूर सिंह के कारण पुंछ को पाकिस्तान में चले जाने से रोके रखा।
हमारी फौजों की सबसे बड़ी समस्या थी, प्रमुख रेल लाइन का पाकिस्तान द्वारा बंद कर देना, जो सियालकोट से जम्मू आती थी। और कोई रेल संपर्क भारत से नहीं था, जिससे हथियार, रसद या खाद्य सामग्री जम्मू-कश्मीर में पहुंचाई जा सकती। तब मैं जम्मू स्थित ट्रेनिंग सेंटर में था। लड़ाई के सामान की बहुत कमी आ गई थी। बंदूकें पर्याप्त संख्या में न होने के कारण मच्छरदानी के डंडे के साथ ट्रेनिंग देने पर मजबूर थे।
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10 राउंड चलवा कर भेजा जा रहा था बार्डर पर
ट्रेनिंग सेंटर जम्मू में भारी संख्या में रंगरुटों को भर्ती किया जा रहा था। लेकिन ट्रेनिंग के नाम पर सिर्फ दो महीने मिलते थे। इसमें पांच से 10 राउंड चलवा कर और थोड़ी बहुत ड्रिल व लड़ाई की ट्रेनिंग देकर बार्डर पर भेजा जा रहा था। मीरां साहिब व रणवीर सिंह पुरा, जम्मू बार्डर पर शरणार्थी कैंप लगाए गए थे, जहां शरणार्थी आ जा रहे थे। हमारे सिपाही पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों को वहां तक सुरक्षा देकर पहुंचाने के काम में भी लगे हुए थे, जिन्हें सियालकोट बार्डर पर पाकिस्तान को सौंपा जा रहा था। रियासत की हालात बहुत खराब हो चुकी थी।
महाराजा हरि सिंह अपने काफिले के साथ अगस्त के आखिर में ही श्रीनगर से जम्मू आ गए थे। उनके साथ उनके एडीसी कर्नल महेल सिंह कुछ आधुनिक हथियार जम्मू लेकर आए थे, जिन्हें चलाने की ट्रेनिंग किसी को नहीं थी। मैं ट्रेनिंग सेंटर सागर मध्य प्रदेश से तभी हथियारों की ट्रेनिंग लेकर आया था। उन्हीं दिनों मुझे महाराजा को टॉमी गन की ट्रेनिंग देने के लिए बुला लिया गया। उन्होंने मुझे अपना अंगरक्षक बना लिया और में उनके साथ साथ रहने लगा।
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महाराजा ने भारत के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए
हमें सूचना मिली कि 21 अक्टूबर की रात को कबाइली घुसपैठियों के वेष में लगभग 5000 की संख्या में पाकिस्तानी फौज ने आक्रमण कर दिया और उरी की तरफ आगे बढ़े। उस इलाके में हमारी बहुत ही कम फौज बची हुई थी, इसलिए चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में 150 जवानों का काफिला 22 अक्टूबर की सुबह बारामुला के लिए निजी वाहनों से निकला। इस काफिले को भारी संख्या में उरी बार्डर पर दुश्मन का सामना करना पड़ा। काफी संख्या में सैनिक शहीद हो गए।
इस पर और सैनिकों की मदद मांगी गई, जो कैप्टन ज्वाला सिंह की अगुवाई में 24 अक्टूबर को उरी पहुंचे। इसके बाद इस टोली से मिलाप किया। बारामुला में घमासान युद्ध चलता रहा और उसी 27 अक्टूबर की रात जिस दिन महाराजा ने भारत के साथ विलय की संधि के ऊपर हस्ताक्षर किए, ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो स्वतंत्र भारत के पहले महावीर चक्र विजेता बने। महाराजा को जवाहरलाल नेहरू के साथ मीटिंग करने 26 अक्टूबर को श्रीनगर जाना तय हुआ। फिर श्रीनगर में 27 अक्टूबर को महाराजा ने विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए।