{"_id":"5a6e1f414f1c1b8c268b7024","slug":"131517166401-jammu-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मछली पकड़ने का ठेका लेने कोई नहीं आया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मछली पकड़ने का ठेका लेने कोई नहीं आया
Updated Mon, 29 Jan 2018 12:36 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बसोहली। रंजीत सागर झील में वार्षिक स्तर पर होने वाला मछली पकड़ने का ठेका 31 जनवरी को समाप्त होने वाला है। ऐसे में विभाग ने शनिवार को जम्मू में बाकायदा बोली प्रक्रिया को अंजाम दिया गया, लेकिन हैरत की बात रही कि विभाग द्वारा पूर्व सूचना के बाद भी किसी भी दल ने बोली प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। बसोहली से पहुंचे स्थानीय मछुआरे भी हताश होकर लौट गए।
दरअसल अधिक राजस्व वसूली के चक्कर में विभाग जहां रंजीत सागर झील में बोली प्रक्रिया की न्यूनतम राशि को पिछले साल से पच्चीस गुणा तक बढ़ा चुका है वहीं मछुआरों का आरोप है कि जलाशय में दो माह ब्रीडिंग सीजन, एक माह के तूफानी मौसम और फिर जलाशय में कई-कई माह तक जलस्तर कम रहने से मछली पकड़ना उम्मीद के अनुरूप भी नहीं हो पाता है। यही वजह है कि गत वर्षों में कुछ ठेकेदार तो बोली के दौरान सरकार को दी गई राशि भी पूरी नहीं कर पाए।
जानकारों की मानें तो जम्मू-कश्मीर के पास रंजीत सागर जलाशय का 58 फीसदी हिस्सा है जबकि इसके साथ ही हिमाचल और पंजाब का हिस्सा भी लगता है। विभाग ने अब बोली की अगली तारीख पांच फरवरी निधार्रित की है जबकि पुराना ठेका 31 जनवरी को समाप्त हो रहा है। यदि जल्द से जल्द विभाग ने बोली प्रक्रिया पूरी नहीं कराई तो विभाग के पास जलाशय के 58 फीसदी इलाके में निगरानी कर पाना मुनासिब नहीं हो पाएगा। ऐसे में गैर कानूनी रूप से पंजाब समेत आसपास के मछुआरे सक्रिय हो जाएंगे और बड़े स्तर पर मछली दोहन की संभावना बढ़ रही है।
विज्ञापन
एक दशक में 80 फीसदी कम रह गई मछुआराें की संख्या
जम्मू में बोली प्रक्रिया के दौरान शनिवार को बसोहली से पहुंचे मछुआरे भी विभाग द्वारा न्यूनतम राशि बढ़ाए जाने के चलते परेशान हैं। बसोहली में रविवार को आयोजित एक बैठक के दौरान रावी फिशरीज कोआपरेटिव सोसाइटी के सदस्यों ने बताया कि एक दशक में मछुआरों के रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वर्ष 2010 में जहां सौ मछुआरे रंजीत सागर झील से मछली पकड़ने के व्यवसाय से जुड़े थे वहीं अब मात्र बीस मछुआरे ही रह गए हैं। गत वर्ष जहां रंजीत सागर जलाशय से मछली पकड़ने का ठेका 40 लाख रुपये सालाना से कम था, वहीं विभाग ने इस बार बेतहाशा दाम बढ़ाकर ठेके की न्यूनतम बोली 50 लाख कर दी है। उन्होंने बताया कि विभाग के इस तरह से न्यूनतम राशि बढ़ाने से मछुआरों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। कुछ लोग जानबूझ कर विभाग को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं जो ठेके का दाम तो बढ़वा देते हैं, लेकिन बोली में भाग नहीं लेते। मछुआरों ने बताया कि यदि स्थानीय लोगों को ही उचित दाम में यह ठेका दिया जाए तो मछुआरों की रोजी रोटी भी बची रहेगी और बाहरी लोगों का दबदबा भी नहीं बढ़ेगा। सरकार भी स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने की बात करती है इसलिए ऐसा किया जाना जरूरी है। बैठक में राकेश मेहरा, राम प्रसाद, मुशताक अहमद, सुरेश कुमार आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
दरअसल अधिक राजस्व वसूली के चक्कर में विभाग जहां रंजीत सागर झील में बोली प्रक्रिया की न्यूनतम राशि को पिछले साल से पच्चीस गुणा तक बढ़ा चुका है वहीं मछुआरों का आरोप है कि जलाशय में दो माह ब्रीडिंग सीजन, एक माह के तूफानी मौसम और फिर जलाशय में कई-कई माह तक जलस्तर कम रहने से मछली पकड़ना उम्मीद के अनुरूप भी नहीं हो पाता है। यही वजह है कि गत वर्षों में कुछ ठेकेदार तो बोली के दौरान सरकार को दी गई राशि भी पूरी नहीं कर पाए।
विज्ञापन
जानकारों की मानें तो जम्मू-कश्मीर के पास रंजीत सागर जलाशय का 58 फीसदी हिस्सा है जबकि इसके साथ ही हिमाचल और पंजाब का हिस्सा भी लगता है। विभाग ने अब बोली की अगली तारीख पांच फरवरी निधार्रित की है जबकि पुराना ठेका 31 जनवरी को समाप्त हो रहा है। यदि जल्द से जल्द विभाग ने बोली प्रक्रिया पूरी नहीं कराई तो विभाग के पास जलाशय के 58 फीसदी इलाके में निगरानी कर पाना मुनासिब नहीं हो पाएगा। ऐसे में गैर कानूनी रूप से पंजाब समेत आसपास के मछुआरे सक्रिय हो जाएंगे और बड़े स्तर पर मछली दोहन की संभावना बढ़ रही है।
विज्ञापन
एक दशक में 80 फीसदी कम रह गई मछुआराें की संख्या
जम्मू में बोली प्रक्रिया के दौरान शनिवार को बसोहली से पहुंचे मछुआरे भी विभाग द्वारा न्यूनतम राशि बढ़ाए जाने के चलते परेशान हैं। बसोहली में रविवार को आयोजित एक बैठक के दौरान रावी फिशरीज कोआपरेटिव सोसाइटी के सदस्यों ने बताया कि एक दशक में मछुआरों के रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वर्ष 2010 में जहां सौ मछुआरे रंजीत सागर झील से मछली पकड़ने के व्यवसाय से जुड़े थे वहीं अब मात्र बीस मछुआरे ही रह गए हैं। गत वर्ष जहां रंजीत सागर जलाशय से मछली पकड़ने का ठेका 40 लाख रुपये सालाना से कम था, वहीं विभाग ने इस बार बेतहाशा दाम बढ़ाकर ठेके की न्यूनतम बोली 50 लाख कर दी है। उन्होंने बताया कि विभाग के इस तरह से न्यूनतम राशि बढ़ाने से मछुआरों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। कुछ लोग जानबूझ कर विभाग को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं जो ठेके का दाम तो बढ़वा देते हैं, लेकिन बोली में भाग नहीं लेते। मछुआरों ने बताया कि यदि स्थानीय लोगों को ही उचित दाम में यह ठेका दिया जाए तो मछुआरों की रोजी रोटी भी बची रहेगी और बाहरी लोगों का दबदबा भी नहीं बढ़ेगा। सरकार भी स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने की बात करती है इसलिए ऐसा किया जाना जरूरी है। बैठक में राकेश मेहरा, राम प्रसाद, मुशताक अहमद, सुरेश कुमार आदि मौजूद रहे।