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Udhampur News: कलश यात्रा के साथ फंगयाल रठियान में शिव महापुराण कथा
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उधमपुर। फंगयाल रठियान में श्री शिव महापुराण कथा के शुभारंभ पर निकाली गई कल्श यात्रा। आयोजक
यदि मन से फूल का ही दर्शन करते रहेंगे तो ध्यान लग जाएगा : संत सुभाष शास्त्री
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। नेशनल हाईवे के पास स्थित नवनिर्मित रत्ना मोती पैलेस फंगयाल रठियान, उधमपुर में सोमवार से शिव महापुराण कथा प्रारंभ हुई। इससे पहले कार्यक्रम के संयोजक शिव कुमार, सतपाल शर्मा व अन्य लोगों ने संत सुभाष शास्त्री का भव्य शोभायात्रा और कलश यात्रा के साथ स्वागत किया और व्यास पूजा कर उनसे आशीर्वाद लिया।
कथा का श्रीगणेश करते हुए स्वामी परमानंद महाराज के शिष्य संत सुभाष शास्त्री ने ध्यान के जिज्ञासुओं से कहा कि ध्यान क्या है ? गुरु तो यही बताते रहे कि आप रोशनी देखें। आप उस चक्र में पहुंच जाएं। आप नाद सुनें, सब ऐसे ही ध्यान बताने वाले मिले। ध्यान का अर्थ है कि एक ही तरह की वूत्ति बार-बार क्या लगातार बनी रहे। बार-बार का मतलब ऐसा नहीं है कि वृत्ति बीच में विनष्ट होकर दूसरी वृत्ति बन जाए और फिर असली वृत्ति आ जाए। जैसे यह गुलाब का फूल है अब आप अपने मन से देखें की यह गुलाब का फूल है। यदि बीच में गुलाब का फूल देखना बंद करके मन कोई और चीज देखने लगे, तो ध्यान टूट गया।
शास्त्री जी ने कहा कि साधना की दृष्टि से ध्यान सबसे सुगम है। ध्यान में किसी धारणा की आवश्यकता नहीं है। ध्यान में हमें अपनी समझ लगाने और योजना बनाने की भी आवश्यकता नहीं है। ध्यान बहुत शुभ स्वाभाविक प्रक्रिया में है। मैं चैतन्य हूं अनुभूति ही ध्यान है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। नेशनल हाईवे के पास स्थित नवनिर्मित रत्ना मोती पैलेस फंगयाल रठियान, उधमपुर में सोमवार से शिव महापुराण कथा प्रारंभ हुई। इससे पहले कार्यक्रम के संयोजक शिव कुमार, सतपाल शर्मा व अन्य लोगों ने संत सुभाष शास्त्री का भव्य शोभायात्रा और कलश यात्रा के साथ स्वागत किया और व्यास पूजा कर उनसे आशीर्वाद लिया।
कथा का श्रीगणेश करते हुए स्वामी परमानंद महाराज के शिष्य संत सुभाष शास्त्री ने ध्यान के जिज्ञासुओं से कहा कि ध्यान क्या है ? गुरु तो यही बताते रहे कि आप रोशनी देखें। आप उस चक्र में पहुंच जाएं। आप नाद सुनें, सब ऐसे ही ध्यान बताने वाले मिले। ध्यान का अर्थ है कि एक ही तरह की वूत्ति बार-बार क्या लगातार बनी रहे। बार-बार का मतलब ऐसा नहीं है कि वृत्ति बीच में विनष्ट होकर दूसरी वृत्ति बन जाए और फिर असली वृत्ति आ जाए। जैसे यह गुलाब का फूल है अब आप अपने मन से देखें की यह गुलाब का फूल है। यदि बीच में गुलाब का फूल देखना बंद करके मन कोई और चीज देखने लगे, तो ध्यान टूट गया।
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शास्त्री जी ने कहा कि साधना की दृष्टि से ध्यान सबसे सुगम है। ध्यान में किसी धारणा की आवश्यकता नहीं है। ध्यान में हमें अपनी समझ लगाने और योजना बनाने की भी आवश्यकता नहीं है। ध्यान बहुत शुभ स्वाभाविक प्रक्रिया में है। मैं चैतन्य हूं अनुभूति ही ध्यान है।
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