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छोटा सा पाप हमारा अनर्थ करने में सक्षम
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उधमपुर: प्रवचन करते हुए सुभाष शास्त्री जी तथा सत्संग का आनंद लेते भक्तजन.
- फोटो : UDHAMPUR
उधमपुर। उधमपुर में आयोजित दो दिवसीय सत्संग के दूसरे दिन कथावाचक सुभाष शास्त्री ने शिव मंदिर नैनसू में सत्संग का आयोजन कर भगवान शिव की महिमा बताई। इस दौरान सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
उन्होंने संगत को समझाया कि हम इंद्रियों को विषयों के दल-दल में फंसा कर सुख की कामना करते हुए एक के उपरांत दूसरा पाप करते हुए जीये जा रहे हैं। इसका परिणाम केवल दुख और कष्ट है। पाप को कभी छोटा न समझो। क्योंकि, जिस तरह जरा सा विष किसी के भी प्राण ले सकता है, जिस प्रकार एक छोटा सा बीज एक विशालकाय वृक्ष बनने में सक्षम होता है, ठीक उसी प्रकार एक छोटा सा पाप हमारा अनर्थ करने में सक्षम है।
कथावाचक ने कहा कि मन में यह कभी विचार न लाना कि काम, क्रोध और लोभ का क्षणिक आवेश हमारा क्या बिगाड़ सकता है? इनसे सदा सावधान रहो। क्योंकि, जरा सी भी असावधानी विनाश को शीघ्र बुला लाती है। 84 लाख योनियों के उपरांत जो यह मनुष्य शरीर हमें मिला है, इसे ही आखिरी जन्म समझना चाहिए। इस जन्म को पाकर भी यदि हमारा कल्याण नहीं हुआ तो किसी जन्म में नहीं हो सकता। यह हमारे पर प्रभु की अपार कृपा है कि उन्होंने हमें मनुष्य जन्म दिया।
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क्योंकि, अगर भगवान चाहते तो हमें किसी और योनि में भी जन्म दे सकते थे। इसलिए, आप अपना कल्याण, प्रभु का स्मरण करते हुए कर सकते हैं। फिर चाहे आप गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी या सन्यासी हों। चाहे आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हों। सभी उसके स्मरण के द्वारा कल्याण कर सकते हैं। शास्त्री जी ने कहा कि आपको जो भी प्राप्त है, उसे प्रभु का प्रसाद मानें। मत समझो दाता अपने को, करो न तुम कुछ भी अभिमान। सविनय करो समर्पण प्रभु को, प्रभु का वस्तु सहित सम्मान।।
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उन्होंने संगत को समझाया कि हम इंद्रियों को विषयों के दल-दल में फंसा कर सुख की कामना करते हुए एक के उपरांत दूसरा पाप करते हुए जीये जा रहे हैं। इसका परिणाम केवल दुख और कष्ट है। पाप को कभी छोटा न समझो। क्योंकि, जिस तरह जरा सा विष किसी के भी प्राण ले सकता है, जिस प्रकार एक छोटा सा बीज एक विशालकाय वृक्ष बनने में सक्षम होता है, ठीक उसी प्रकार एक छोटा सा पाप हमारा अनर्थ करने में सक्षम है।
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कथावाचक ने कहा कि मन में यह कभी विचार न लाना कि काम, क्रोध और लोभ का क्षणिक आवेश हमारा क्या बिगाड़ सकता है? इनसे सदा सावधान रहो। क्योंकि, जरा सी भी असावधानी विनाश को शीघ्र बुला लाती है। 84 लाख योनियों के उपरांत जो यह मनुष्य शरीर हमें मिला है, इसे ही आखिरी जन्म समझना चाहिए। इस जन्म को पाकर भी यदि हमारा कल्याण नहीं हुआ तो किसी जन्म में नहीं हो सकता। यह हमारे पर प्रभु की अपार कृपा है कि उन्होंने हमें मनुष्य जन्म दिया।
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क्योंकि, अगर भगवान चाहते तो हमें किसी और योनि में भी जन्म दे सकते थे। इसलिए, आप अपना कल्याण, प्रभु का स्मरण करते हुए कर सकते हैं। फिर चाहे आप गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी या सन्यासी हों। चाहे आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हों। सभी उसके स्मरण के द्वारा कल्याण कर सकते हैं। शास्त्री जी ने कहा कि आपको जो भी प्राप्त है, उसे प्रभु का प्रसाद मानें। मत समझो दाता अपने को, करो न तुम कुछ भी अभिमान। सविनय करो समर्पण प्रभु को, प्रभु का वस्तु सहित सम्मान।।

उधमपुर: प्रवचन करते हुए सुभाष शास्त्री जी तथा सत्संग का आनंद लेते भक्तजन.- फोटो : UDHAMPUR