{"_id":"6993705988412075e40a6ad3","slug":"religious-programme-udhampur-news-c-202-1-sjam1011-132693-2026-02-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"भक्ति और ज्ञान से किए कर्म ही जीवात्मा को श्रेय मार्ग पर चलाते हैं : सुभाष शास्त्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भक्ति और ज्ञान से किए कर्म ही जीवात्मा को श्रेय मार्ग पर चलाते हैं : सुभाष शास्त्री
विज्ञापन
उधमपुर। ओमाला जखैनी स्थित अखंड परमधाम आश्रम में सोमवार को चौथे दिन कथा जारी रही। सुभाष शास्त्री महाराज ने कहा कि शिव महापुराण में ज्ञान का अर्थ केवल किताबी जानकारी नहीं बल्कि यह बोध है कि कण-कण में शिव व्याप्त हैं। सच्चा ज्ञान परब्रह्म (निराकार शिव) को समझना चाहिए, आत्मा का परमात्मा से मिलन और अहंकार को त्याग कर शिव-शक्ति के कल्याणकारी स्वरूप को जानना है।
उन्होंने आगे समझाया कि जीवन यात्रा सही दिशा की तरफ हो, इसके लिए भक्ति और ज्ञान का होना जरूरी है। भक्ति और ज्ञान से किए गए कर्म ही जीवात्मा को श्रेय मार्ग पर चलाते हैं और हम जीवन यात्रा करते हुए परम पद की ओर बढ़ सकते हैं। गलत मार्ग से बचने और सन्मार्ग पर चलने के लिए दोनों का होना जरूरी होता है। भक्ति का आधार है हृदय और ज्ञान का आधार है स्थिर बुद्धि। स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति हितकारी और अहितकारी कार्यों की परीक्षा करके जो हितकारी कार्य होते हैं, वह ही करता है। जिन अज्ञानी मनुष्यों की आत्मा मोह-अज्ञान से आवृत्त रहती है, ऐसे मूर्ख मनुष्य अहितकारी कार्य कर दुखों को भोगते हैं।
आत्मज्ञान यदि प्राप्त करना है तो तप और साधना ही एकमात्र रास्ता है। साधक को सीमित बुद्धि और अहंकार को त्यागकर शिव को ही सर्वोच्च सत्य और स्वयं को उनका अंश समझना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
उन्होंने आगे समझाया कि जीवन यात्रा सही दिशा की तरफ हो, इसके लिए भक्ति और ज्ञान का होना जरूरी है। भक्ति और ज्ञान से किए गए कर्म ही जीवात्मा को श्रेय मार्ग पर चलाते हैं और हम जीवन यात्रा करते हुए परम पद की ओर बढ़ सकते हैं। गलत मार्ग से बचने और सन्मार्ग पर चलने के लिए दोनों का होना जरूरी होता है। भक्ति का आधार है हृदय और ज्ञान का आधार है स्थिर बुद्धि। स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति हितकारी और अहितकारी कार्यों की परीक्षा करके जो हितकारी कार्य होते हैं, वह ही करता है। जिन अज्ञानी मनुष्यों की आत्मा मोह-अज्ञान से आवृत्त रहती है, ऐसे मूर्ख मनुष्य अहितकारी कार्य कर दुखों को भोगते हैं।
विज्ञापन
आत्मज्ञान यदि प्राप्त करना है तो तप और साधना ही एकमात्र रास्ता है। साधक को सीमित बुद्धि और अहंकार को त्यागकर शिव को ही सर्वोच्च सत्य और स्वयं को उनका अंश समझना चाहिए।
विज्ञापन