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चिनैनी में इस बार भी नहीं आएंगे राम
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चिनैनी। सौ साल पुरानी चिनैनी की रामलीला पर फिर से कोरोना का ग्रहण लग गया है। कोरोना संक्रमण के चलते लगातार दूसरे साल रामलीला का मंचन नहीं होगा। इस कारण लोगों में काफी मायूसी है। क्योंकि इस बार फिर से न तो प्रभु राम जन्म और न ही सीता हरण के दृश्यों को लोग देख पाएंगे।
राजा महाराजाओं के समय से चली आ रही चिनैनी की रामलीला आतंकवाद के समय भी जारी रही, लेकिन कोरोना के चलते लगातार दूसरी बार इसका मंचन नहीं होगा। इसका कलाकारों व लोगों को काफी मलाल है। आयोजकों ने बताया कि रात दस बजे कारोना कर्फ्यू लगने के कारण मंचन में दिक्कतें आएंगी। इसलिए लगातार दूसरे साल मंचन नहीं करने का फैसला लिया है। रामलीला को देखने के लिए चिनैनी के साथ ही दूसरे जिलाें से भी लोग आते थे। इस बारे में आयोजकों ने सभी को सूचना दे दी है।
पेड़ के नीचे मशाल जलाकर होती थी रामलीला
चिनैनी की रामलीला राजा महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है, जो पेड़ के नीचे आरंभ हुई थी। उस समय रामलीला का स्थायी मंच नहीं था। कलाकार मशाल जलाकर रामलीला में अभिनय करते थे। 1965 में रामलीला को स्थायी मंच मिला और बिजली भी जिसके बाद बल्ब की रोशनी में मंचन होने लगा। इसमें सभी समुदायों के लोग हिस्सा लेकर भाईचारे की मिसाल पेश करते हैं। 1983 में चिनैनी में दो जगहों पर रामलीला का आयोजन होना शुरू हुआ।
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राजा महाराजाओं के समय से चली आ रही चिनैनी की रामलीला आतंकवाद के समय भी जारी रही, लेकिन कोरोना के चलते लगातार दूसरी बार इसका मंचन नहीं होगा। इसका कलाकारों व लोगों को काफी मलाल है। आयोजकों ने बताया कि रात दस बजे कारोना कर्फ्यू लगने के कारण मंचन में दिक्कतें आएंगी। इसलिए लगातार दूसरे साल मंचन नहीं करने का फैसला लिया है। रामलीला को देखने के लिए चिनैनी के साथ ही दूसरे जिलाें से भी लोग आते थे। इस बारे में आयोजकों ने सभी को सूचना दे दी है।
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पेड़ के नीचे मशाल जलाकर होती थी रामलीला
चिनैनी की रामलीला राजा महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है, जो पेड़ के नीचे आरंभ हुई थी। उस समय रामलीला का स्थायी मंच नहीं था। कलाकार मशाल जलाकर रामलीला में अभिनय करते थे। 1965 में रामलीला को स्थायी मंच मिला और बिजली भी जिसके बाद बल्ब की रोशनी में मंचन होने लगा। इसमें सभी समुदायों के लोग हिस्सा लेकर भाईचारे की मिसाल पेश करते हैं। 1983 में चिनैनी में दो जगहों पर रामलीला का आयोजन होना शुरू हुआ।
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