{"_id":"65a036a8ef65a4472d0b4514","slug":"mobile-addiction-udhampur-news-c-202-1-sjam1011-6213-2024-01-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"Udhampur News: मोबाइल ने युवाओं को किया लोहड़ी की परंपराओं से दूर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Udhampur News: मोबाइल ने युवाओं को किया लोहड़ी की परंपराओं से दूर
Fri, 12 Jan 2024 12:12 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
Updated Fri, 12 Jan 2024 12:12 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लुप्त होती जा रही सुंदर मुंदरिए हो और मूली द पत्तर हरया भरेया टोलियों की रौनक; त्योहारों से जुड़ी परंपराओं से वंचित हो रही मौजूदा पीढ़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। लोहड़ी आने से 20 दिन पहले ही युवाओं और बच्चों में काफी उत्साह होता था। लोग भी कई तरह की तैयारियां करते थे। बच्चे लोहड़ी मांगने के लिए घर पर ही रंग-बिरंगे छज्जे तैयार करते थे। मगर, अब बच्चों और युवाओं में यह उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है।
हालांकि लोहड़ी से कुछ दिन पहले ही लड़के और लड़कियां टोली बनाकर लोगों के घरों में लोहड़ी मांगने जाते थे। इसका मुख्य कारण मोबाइल को ही कह सकते हैं। मोबाइल ने छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक सबको चपेट में लिया है। इससे युवा वर्ग में लोहड़ी को लेकर कोई खास उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है। गौरतलब है कि आज से कुछ साल पहले तक लोहड़ी के एक माह पहले ही लड़के व लड़कियों की टोलियां निकलती थीं। वहीं कई युवा ढोल नगाड़ों के साथ हिरण की झांकी निकालते थे। लोगों के घरों में जाकर लोहड़ी मांगने के साथ ही खूब भंगड़ा डाला जाता था। जब भी किसी घर पर हिरण पहुंचता था तो वहां पर पूरा मोहल्ला पहुंच जाता था और नाच गाने के साथ ही लोहड़ी के गीत भी गाए जाते थे। खासतौर पर हिरण लेकर युवा उन्हीं लोगों के घर ज्यादा जाते थे, जिनके घरों में शादियां हुईं हों। इस पर उन्हें अच्छी खासी लोहड़ी मिल जाती थी। वहीं कई बच्चे रंग बिरंगे छज्जे लेकर लोगों के घरों में लोहड़ी मांगने जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं है क्योंकि युवा वर्ग मौजूदा समय में सिर्फ मोबाइल तक ही सीमित रह गया है। लोहड़ी मनाने की परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब कोई चहल पहल देखने को नहीं मिल रही। आने वाले 10 साल में लोग त्योहार का महत्व भूल जाएंगे।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हर त्योहार परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। खास तौर पर लोहड़ी आने से 15 दिन पहले से ही गांव के बच्चे अपने-अपने घरों में रंग बिरंगे छज्जे तैयार करके लोहड़ी मांगने के लिए जाते हैं। शहर में इक्का-दुक्का ही बच्चों की टोलियां नजर आती हैं। लोगों ने बताया कि पहले लोहड़ी के त्योहार को लेकर एक महीना पहले ही चहल पहल शुरू हो जाती थी। घर के बड़े बुजुर्ग अपने नाती के लिए मूंगफली-नारियल का हार बनाकर नवजात शिशुओं को पहनाते थे। मगर अब यह परंपरा सिर्फ गांव तक ही सीमित रह गई है। बाजारों में भी बिकने वाले रंग बिरंगे छज्जे इका दुक्का दुकानों पर ही बेचने के लिए रखे जाते हैं। दुकानदारों का कहना है कि अब नाममात्र ही छज्जे बिक रहे हैं, क्योंकि अब बच्चे भी छज्जे लेने नहीं आते हैं।
विज्ञापन
आज के इस युग में अब त्योहारों का कोई पता नहीं चलता, क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक सभी अपने कामकाज में व्यस्त हैं कि उन्हें तो यह भी पता नहीं चलता कि त्योहार कब आया और कब चला गया। मगर हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। कोई भी त्योहार आने से पहले ही सभी तैयारियां कर ली जाती थी। खासतौर पर लोहड़ी के त्यौहार आने का बेसब्री से इंतजार बच्चे व युवा करते थे। इसमें उन्हें पता होता था कि वह सब इकट्ठे होकर लोहड़ी मांगने जाएंगे। अब ऐसा समय आ गया है कि लोहड़ी की मुबारकबाद भी लोग फोन पर दे रहे हैं।
मुंशी राम
अब बच्चों के पास समय नहीं है। एक तरफ बच्चों पर पढ़ाई का बोझ तो दूसरी तरफ मोबाइल। तो ऐसे में बच्चे व युवा वर्ग लोहड़ी के त्यौहार में वो उत्साह नहीं दिखा पा रहे हैं। हमारे समय में लड़कियों और लड़कों की अलग-अलग टोली होती थी। सभी लोहड़ी से ठीक 20 दिन पहले लोगों के घरों में जाकर लोहड़ी मांगना शुरू कर देते थे।
बिमला गुप्ता
लोहड़ी मांगते समय पारंपरिक लोक गीत गाकर लड़कों की टोली सुंदर मुंदरिए हो तेरा कौन बचारा हो, दूल्हा पटठी वाला और लड़कियां की टोली मूली द पतर हरेया भरेया, वीर सुहागन घोड़ी चडेया जैसे गीत गाकर लोहड़ी मांगते थे। अब तो आलम यह हो गया है कि लोग देखते रहते हैं कि कब बच्चे उनके घर पर लोहड़ी
मांगने आएं।
शाम लाल
लोहड़ी से पहले ही बाजारों और मोहल्ले में लोहड़ी मांगने के लिए बच्चों की टोलियां आना शुरू हो जाती थी। मगर अब लोहड़ी में एक दिन शेष बचा है अभी तक कोई भी बच्चा या कोई युवा लोहड़ी मांगते नहीं दिखा। हमारे जमाने में लोहड़ी को जलाने के लिए एक महीना पहले से ही लकड़ियां इकटठी करना शुरू कर देते थे।
बुजुर्ग सत्यवति
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। लोहड़ी आने से 20 दिन पहले ही युवाओं और बच्चों में काफी उत्साह होता था। लोग भी कई तरह की तैयारियां करते थे। बच्चे लोहड़ी मांगने के लिए घर पर ही रंग-बिरंगे छज्जे तैयार करते थे। मगर, अब बच्चों और युवाओं में यह उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है।
हालांकि लोहड़ी से कुछ दिन पहले ही लड़के और लड़कियां टोली बनाकर लोगों के घरों में लोहड़ी मांगने जाते थे। इसका मुख्य कारण मोबाइल को ही कह सकते हैं। मोबाइल ने छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक सबको चपेट में लिया है। इससे युवा वर्ग में लोहड़ी को लेकर कोई खास उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है। गौरतलब है कि आज से कुछ साल पहले तक लोहड़ी के एक माह पहले ही लड़के व लड़कियों की टोलियां निकलती थीं। वहीं कई युवा ढोल नगाड़ों के साथ हिरण की झांकी निकालते थे। लोगों के घरों में जाकर लोहड़ी मांगने के साथ ही खूब भंगड़ा डाला जाता था। जब भी किसी घर पर हिरण पहुंचता था तो वहां पर पूरा मोहल्ला पहुंच जाता था और नाच गाने के साथ ही लोहड़ी के गीत भी गाए जाते थे। खासतौर पर हिरण लेकर युवा उन्हीं लोगों के घर ज्यादा जाते थे, जिनके घरों में शादियां हुईं हों। इस पर उन्हें अच्छी खासी लोहड़ी मिल जाती थी। वहीं कई बच्चे रंग बिरंगे छज्जे लेकर लोगों के घरों में लोहड़ी मांगने जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं है क्योंकि युवा वर्ग मौजूदा समय में सिर्फ मोबाइल तक ही सीमित रह गया है। लोहड़ी मनाने की परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब कोई चहल पहल देखने को नहीं मिल रही। आने वाले 10 साल में लोग त्योहार का महत्व भूल जाएंगे।
विज्ञापन
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हर त्योहार परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। खास तौर पर लोहड़ी आने से 15 दिन पहले से ही गांव के बच्चे अपने-अपने घरों में रंग बिरंगे छज्जे तैयार करके लोहड़ी मांगने के लिए जाते हैं। शहर में इक्का-दुक्का ही बच्चों की टोलियां नजर आती हैं। लोगों ने बताया कि पहले लोहड़ी के त्योहार को लेकर एक महीना पहले ही चहल पहल शुरू हो जाती थी। घर के बड़े बुजुर्ग अपने नाती के लिए मूंगफली-नारियल का हार बनाकर नवजात शिशुओं को पहनाते थे। मगर अब यह परंपरा सिर्फ गांव तक ही सीमित रह गई है। बाजारों में भी बिकने वाले रंग बिरंगे छज्जे इका दुक्का दुकानों पर ही बेचने के लिए रखे जाते हैं। दुकानदारों का कहना है कि अब नाममात्र ही छज्जे बिक रहे हैं, क्योंकि अब बच्चे भी छज्जे लेने नहीं आते हैं।
विज्ञापन
आज के इस युग में अब त्योहारों का कोई पता नहीं चलता, क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक सभी अपने कामकाज में व्यस्त हैं कि उन्हें तो यह भी पता नहीं चलता कि त्योहार कब आया और कब चला गया। मगर हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। कोई भी त्योहार आने से पहले ही सभी तैयारियां कर ली जाती थी। खासतौर पर लोहड़ी के त्यौहार आने का बेसब्री से इंतजार बच्चे व युवा करते थे। इसमें उन्हें पता होता था कि वह सब इकट्ठे होकर लोहड़ी मांगने जाएंगे। अब ऐसा समय आ गया है कि लोहड़ी की मुबारकबाद भी लोग फोन पर दे रहे हैं।
मुंशी राम
अब बच्चों के पास समय नहीं है। एक तरफ बच्चों पर पढ़ाई का बोझ तो दूसरी तरफ मोबाइल। तो ऐसे में बच्चे व युवा वर्ग लोहड़ी के त्यौहार में वो उत्साह नहीं दिखा पा रहे हैं। हमारे समय में लड़कियों और लड़कों की अलग-अलग टोली होती थी। सभी लोहड़ी से ठीक 20 दिन पहले लोगों के घरों में जाकर लोहड़ी मांगना शुरू कर देते थे।
बिमला गुप्ता
लोहड़ी मांगते समय पारंपरिक लोक गीत गाकर लड़कों की टोली सुंदर मुंदरिए हो तेरा कौन बचारा हो, दूल्हा पटठी वाला और लड़कियां की टोली मूली द पतर हरेया भरेया, वीर सुहागन घोड़ी चडेया जैसे गीत गाकर लोहड़ी मांगते थे। अब तो आलम यह हो गया है कि लोग देखते रहते हैं कि कब बच्चे उनके घर पर लोहड़ी
मांगने आएं।
शाम लाल
लोहड़ी से पहले ही बाजारों और मोहल्ले में लोहड़ी मांगने के लिए बच्चों की टोलियां आना शुरू हो जाती थी। मगर अब लोहड़ी में एक दिन शेष बचा है अभी तक कोई भी बच्चा या कोई युवा लोहड़ी मांगते नहीं दिखा। हमारे जमाने में लोहड़ी को जलाने के लिए एक महीना पहले से ही लकड़ियां इकटठी करना शुरू कर देते थे।
बुजुर्ग सत्यवति