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Udhampur News: शहीद के सम्मान के लिए संघर्ष कब तक
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उधमपुर। गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल कसूरी, जिसे शहीद के नाम पर किए जाने की मांग उठ रही है।
- बलिदानी सिपाही ज्ञान चंद के नाम पर नहीं हो पाया स्कूल का नामकरण, 1965 की भारत-पाक जंग में हुए थे शहीद
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। जम्मू-कश्मीर में बलिदानियों के सम्मान में कई स्कूलों का नामकरण किया गया है लेकिन शहीद सिपाही ज्ञान चंद के परिवार और पंचायत सेर वालां के लोगों की मांग आज तक पूरी नहीं हो पाई। वे चाहते हैं कि बलिदानी के नाम पर सरकारी स्कूल का नाम रखा जाए ताकि युवाओं को प्रेरणा मिल सके।
1965 में पाकिस्तानी सेना से लोहा लेते हुए जिला उधमपुर की तहसील रामनगर की पंचायत सेर वालां के रहने वाले सिपाही ज्ञान चंद देश के लिए बलिदान हो गए थे। शहीद का परिवार इलाके के हायर सेकेंडरी स्कूल कसूरी का नामकरण उनके नाम पर करने के लिए बीते चार साल से संघर्ष कर रहा है लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से इसे मंजूरी नहीं मिल पाई है।क्षेत्रवासियों का कहना है कि चार साल पहले जब प्रदेश प्रशासन ने 2021 में स्कूलों का नाम शहीदों के नाम पर करने की पहल शुरू की, तब स्कूल समिति ने कसूरी स्कूल को उनके नाम पर करने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन सूची में नाम शामिल नहीं किया गया। करीब दो साल बाद दोबारा से प्रस्ताव तैयार कर भेजा गया लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।
शहीद सिपाही ज्ञान चंद, 9 डोगरा बटालियन की एसपी कंपनी के जवान (बेल्ट नंबर 3949101) थे। 1965 में शकरगढ़ सेक्टर जम्मू में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए उन्होंने वीरगति पाई थी। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 27 साल थी। उनकी धर्मपत्नी का भी स्वर्गवास हो चुका है और बेटी मीनाक्षी की शादी हो गई है। वे गांव के इकलौते ऐसे शहीद हैं।
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दो बार प्रस्ताव भेजा, नहीं मिली मंजूरी
यह काफी निराशाजनक है कि देश की रक्षा करते हुए बलिदान हुए गांव के शहीद के सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। स्कूल का नामकरण करने के लिए दो बार प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है लेकिन अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी गई है।
-कुलवीर सिंह, स्थानीय निवासी
गांव के लोग मायूस हैं
शहीद किसी एक परिवार का सदस्य मात्र नहीं होता, बल्कि पूरे देश का लाल होता है। पाकिस्तान से लोहा लेते हुए वीरगति हासिल करने वाले शहीद के सम्मान में देरी से पूरे गांव के लोग काफी मायूस हैं।
-रतन सिंह अंताल, पूर्व नायब सरपंच
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स्कूल व सड़कों का शहीदों के नाम पर नामकरण किया जाना प्रशासन की अच्छी पहल है। इससे क्षेत्र के तमाम लोग और खासकर युवा वर्ग को अपने शहीदों के इतिहास और उनकी वीरता के बारे में जानकारी मिलती है और वे उनसे प्रेरित होते हैं। लेकिन हमारे गांव के शहीद के नाम पर स्कूला का नामकरण न होना निराशा पैदा करता है।
-जुल्फी राम, स्थानीय निवासी
कोट..
गांव के शहीद सिपाही ज्ञान चंद की शहादत पर पूरे क्षेत्र को गर्व है। हर कोई चाहता है कि उनकी शहादत के बारे में सदियों तक लोग जाने और उन्हें नमन उनसे प्रेरणा लेते रहे हैं। सरकार, प्रशासन और शिक्षा विभाग से मेरी अपील है कि जल्द से जल्द शहीद के सम्मान में इस स्कूल के नामकरण को मंजूरी दी जाए।
-आरती शर्मा, पूर्व बीडीसी चेयरमैन, ब्लाॅक घोरड़ी
कोट...
जो भी प्रस्ताव मुख्य शिक्षा कार्यालय में दिए जाते हैं उन्हें मंजूरी के लिए डायरेक्टरेट ऑफिस भेज दिया जाता है। इसकी मंजूरी की प्रक्रिया में कुछ वक्त लगता है। उम्मीद है कि कसूरी स्कूल को भी जल्द ही शहीद के नाम पर किए जाने की भी मंजूरी मिल जाएगी।
-कल्पना जसरोटिया, डिप्टी सीईओ, उधमपुर
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संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। जम्मू-कश्मीर में बलिदानियों के सम्मान में कई स्कूलों का नामकरण किया गया है लेकिन शहीद सिपाही ज्ञान चंद के परिवार और पंचायत सेर वालां के लोगों की मांग आज तक पूरी नहीं हो पाई। वे चाहते हैं कि बलिदानी के नाम पर सरकारी स्कूल का नाम रखा जाए ताकि युवाओं को प्रेरणा मिल सके।
1965 में पाकिस्तानी सेना से लोहा लेते हुए जिला उधमपुर की तहसील रामनगर की पंचायत सेर वालां के रहने वाले सिपाही ज्ञान चंद देश के लिए बलिदान हो गए थे। शहीद का परिवार इलाके के हायर सेकेंडरी स्कूल कसूरी का नामकरण उनके नाम पर करने के लिए बीते चार साल से संघर्ष कर रहा है लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से इसे मंजूरी नहीं मिल पाई है।क्षेत्रवासियों का कहना है कि चार साल पहले जब प्रदेश प्रशासन ने 2021 में स्कूलों का नाम शहीदों के नाम पर करने की पहल शुरू की, तब स्कूल समिति ने कसूरी स्कूल को उनके नाम पर करने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन सूची में नाम शामिल नहीं किया गया। करीब दो साल बाद दोबारा से प्रस्ताव तैयार कर भेजा गया लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।
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शहीद सिपाही ज्ञान चंद, 9 डोगरा बटालियन की एसपी कंपनी के जवान (बेल्ट नंबर 3949101) थे। 1965 में शकरगढ़ सेक्टर जम्मू में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए उन्होंने वीरगति पाई थी। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 27 साल थी। उनकी धर्मपत्नी का भी स्वर्गवास हो चुका है और बेटी मीनाक्षी की शादी हो गई है। वे गांव के इकलौते ऐसे शहीद हैं।
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दो बार प्रस्ताव भेजा, नहीं मिली मंजूरी
यह काफी निराशाजनक है कि देश की रक्षा करते हुए बलिदान हुए गांव के शहीद के सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। स्कूल का नामकरण करने के लिए दो बार प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है लेकिन अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी गई है।
-कुलवीर सिंह, स्थानीय निवासी
गांव के लोग मायूस हैं
शहीद किसी एक परिवार का सदस्य मात्र नहीं होता, बल्कि पूरे देश का लाल होता है। पाकिस्तान से लोहा लेते हुए वीरगति हासिल करने वाले शहीद के सम्मान में देरी से पूरे गांव के लोग काफी मायूस हैं।
-रतन सिंह अंताल, पूर्व नायब सरपंच
स्कूल व सड़कों का शहीदों के नाम पर नामकरण किया जाना प्रशासन की अच्छी पहल है। इससे क्षेत्र के तमाम लोग और खासकर युवा वर्ग को अपने शहीदों के इतिहास और उनकी वीरता के बारे में जानकारी मिलती है और वे उनसे प्रेरित होते हैं। लेकिन हमारे गांव के शहीद के नाम पर स्कूला का नामकरण न होना निराशा पैदा करता है।
-जुल्फी राम, स्थानीय निवासी
कोट..
गांव के शहीद सिपाही ज्ञान चंद की शहादत पर पूरे क्षेत्र को गर्व है। हर कोई चाहता है कि उनकी शहादत के बारे में सदियों तक लोग जाने और उन्हें नमन उनसे प्रेरणा लेते रहे हैं। सरकार, प्रशासन और शिक्षा विभाग से मेरी अपील है कि जल्द से जल्द शहीद के सम्मान में इस स्कूल के नामकरण को मंजूरी दी जाए।
-आरती शर्मा, पूर्व बीडीसी चेयरमैन, ब्लाॅक घोरड़ी
कोट...
जो भी प्रस्ताव मुख्य शिक्षा कार्यालय में दिए जाते हैं उन्हें मंजूरी के लिए डायरेक्टरेट ऑफिस भेज दिया जाता है। इसकी मंजूरी की प्रक्रिया में कुछ वक्त लगता है। उम्मीद है कि कसूरी स्कूल को भी जल्द ही शहीद के नाम पर किए जाने की भी मंजूरी मिल जाएगी।
-कल्पना जसरोटिया, डिप्टी सीईओ, उधमपुर