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सिर्फ दिव्यता से प्रेम करें : सुभाष शास्त्री
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उधमपुर। जिब मजालता में सत्संग का आयोजन किया गया। इसमें संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि प्रेम शब्द को हर कोई अपने-अपने तरीके से समझता है। असल बात यह है कि प्रेम यदि शक्ति पूर्ण है तो वह प्रेम नहीं। प्रेम देना चाहता है, अगर लेना चाहे तो वह प्रेम नहीं।
उन्होंने कहा कि काम बंधन है और प्रेम प्रसन्नता देने वाला है। कामवासना जहां तुम्हें बंधन में बांधती है, वहां प्रेम तुमको प्रसन्नता प्रदान करता है। प्रेम एक पवित्र शुद्ध चीज है, जबकि कामवासना एक अशुद्ध चीज है। प्रेम एक पुष्प है और काम एक कांटा है। प्रेम वास्तव में तभी प्रेम कहा जाएगा, जब दिव्यता को समझे, अनुभव करे और सिर्फ दिव्यता से ही प्रेम करे, आत्मा से ही प्रेम करे। इस प्रकार का प्रेम ही सच्चा प्रेम कहा जा सकता है।
संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि मनुष्य आपस में प्रेमपूर्वक रहे तो संसार कितना सुंदर हो जाए लेकिन हमारा अहंकार हमें प्रेम करने नहीं देता। यदि हम अहंकारी हैं तो हम प्रेम करने का दिखावा ही कर सकते हैं। वास्तव में प्रेम नहीं कर सकते और संक्षेप में आपको बताएं कि प्रेम ही प्रभु हैं, इसलिए गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णन है जिन प्रेम कियो और तिन ही प्रभ पायो- इसलिए अहंकार का त्याग कर हर जीव से हर प्राणी से सदैव प्रेम करें। परिणामतः आपको आत्म सुख की अनुभूति होगी। उन्होंने कहा कि प्रेम है, इसे ज्यादा विस्तारपूर्वक समझाना कुछ कठिन है। फिर भी मां का प्रेम औलाद के लिए, माली का बाग के लिए, गुरु का शिष्य के लिए और भक्त का अपने भगवान के लिए। इन सभी में लेश मात्र भी अहंकार या वासना नहीं होती, इसलिए सदा सबसे से प्रेम करें।
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उन्होंने कहा कि काम बंधन है और प्रेम प्रसन्नता देने वाला है। कामवासना जहां तुम्हें बंधन में बांधती है, वहां प्रेम तुमको प्रसन्नता प्रदान करता है। प्रेम एक पवित्र शुद्ध चीज है, जबकि कामवासना एक अशुद्ध चीज है। प्रेम एक पुष्प है और काम एक कांटा है। प्रेम वास्तव में तभी प्रेम कहा जाएगा, जब दिव्यता को समझे, अनुभव करे और सिर्फ दिव्यता से ही प्रेम करे, आत्मा से ही प्रेम करे। इस प्रकार का प्रेम ही सच्चा प्रेम कहा जा सकता है।
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संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि मनुष्य आपस में प्रेमपूर्वक रहे तो संसार कितना सुंदर हो जाए लेकिन हमारा अहंकार हमें प्रेम करने नहीं देता। यदि हम अहंकारी हैं तो हम प्रेम करने का दिखावा ही कर सकते हैं। वास्तव में प्रेम नहीं कर सकते और संक्षेप में आपको बताएं कि प्रेम ही प्रभु हैं, इसलिए गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णन है जिन प्रेम कियो और तिन ही प्रभ पायो- इसलिए अहंकार का त्याग कर हर जीव से हर प्राणी से सदैव प्रेम करें। परिणामतः आपको आत्म सुख की अनुभूति होगी। उन्होंने कहा कि प्रेम है, इसे ज्यादा विस्तारपूर्वक समझाना कुछ कठिन है। फिर भी मां का प्रेम औलाद के लिए, माली का बाग के लिए, गुरु का शिष्य के लिए और भक्त का अपने भगवान के लिए। इन सभी में लेश मात्र भी अहंकार या वासना नहीं होती, इसलिए सदा सबसे से प्रेम करें।
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