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Srinagar News: एनडीपीएस कोर्ट ने 10 साल से गिरफ्तारी से बच रहे व्यक्ति की जमानत अर्जी की खारिज
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। बारामुला की एक स्पेशल एनडीपीएस कोर्ट ने उस आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। आरोपी चरस बरामदगी के मामले में एक दशक से ज्यादा समय तक फरार रहा था।
स्पेशल जज अब्दुल कयूम मीर ने बारामुला पुलिस स्टेशन में एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर के सिलसिले में मोहम्मद रफीक वानी की जमानत अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने पुलिस की उस अर्जी को भी मंजूरी दे दी जिसमें धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच जिसमें टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड भी शामिल है, की इजाजत मांगी गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार 24 मार्च 2016 को कनिस्पोरा में एक पुलिस नाके पर पॉलीथीन बैग लिए हुए दो संदिग्धों को रोका गया। एक आरोपी शकील अहमद वानी को तीन किलो चरस के साथ पकड़ा गया जबकि दूसरा कथित तौर पर भाग गया और तीन किलो नशीले पदार्थ वाला दूसरा बैग छोड़ गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार कुल छह किलो की बरामदगी एनडीपीएस एक्ट के तहत कमर्शियल मात्रा के दायरे में आती है।
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अभियोजन पक्ष ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी ने भागने वाले संदिग्ध की पहचान अपने भाई मोहम्मद रफीक वानी के तौर पर की थी। जहां गिरफ्तार आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, वहीं रफीक कथित तौर पर गिरफ्तारी से बचता रहा और अगस्त 2016 में उसे घोषित अपराधी करार दिया गया जिसके बाद इस साल मई में उसने कोर्ट के सामने सरेंडर किया।
जमानत की मांग करते हुए आरोपी ने दावा किया कि वह कभी फरार नहीं हुआ था। उसने कहा कि उसने पंचायत और जिला विकास परिषद के चुनाव खुलेआम लड़े थे और सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहा था। अभियोजन पक्ष ने अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी जानबूझकर 10 साल से ज्यादा समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा। पकड़े जाने से बचने के लिए अपना हुलिया बदला और उस पर चार अन्य आपराधिक मामले भी चल रहे हैं। उसने आगे तर्क दिया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत सख्त शर्तें उसे जमानत पर रिहा करने से रोकती हैं। कोर्ट ने कहा कि आरोपी एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत दो जरूरी शर्तों को पूरा करने में नाकाम रहा।
कोर्ट ने जांच एजेंसी को आगे की जांच पूरी करने और 60 दिनों के भीतर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के जल्द सुनवाई के अधिकार की रक्षा के लिए यह समय-सीमा जरूरी थी।
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श्रीनगर। बारामुला की एक स्पेशल एनडीपीएस कोर्ट ने उस आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। आरोपी चरस बरामदगी के मामले में एक दशक से ज्यादा समय तक फरार रहा था।
स्पेशल जज अब्दुल कयूम मीर ने बारामुला पुलिस स्टेशन में एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर के सिलसिले में मोहम्मद रफीक वानी की जमानत अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने पुलिस की उस अर्जी को भी मंजूरी दे दी जिसमें धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच जिसमें टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड भी शामिल है, की इजाजत मांगी गई थी।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार 24 मार्च 2016 को कनिस्पोरा में एक पुलिस नाके पर पॉलीथीन बैग लिए हुए दो संदिग्धों को रोका गया। एक आरोपी शकील अहमद वानी को तीन किलो चरस के साथ पकड़ा गया जबकि दूसरा कथित तौर पर भाग गया और तीन किलो नशीले पदार्थ वाला दूसरा बैग छोड़ गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार कुल छह किलो की बरामदगी एनडीपीएस एक्ट के तहत कमर्शियल मात्रा के दायरे में आती है।
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अभियोजन पक्ष ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी ने भागने वाले संदिग्ध की पहचान अपने भाई मोहम्मद रफीक वानी के तौर पर की थी। जहां गिरफ्तार आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, वहीं रफीक कथित तौर पर गिरफ्तारी से बचता रहा और अगस्त 2016 में उसे घोषित अपराधी करार दिया गया जिसके बाद इस साल मई में उसने कोर्ट के सामने सरेंडर किया।
जमानत की मांग करते हुए आरोपी ने दावा किया कि वह कभी फरार नहीं हुआ था। उसने कहा कि उसने पंचायत और जिला विकास परिषद के चुनाव खुलेआम लड़े थे और सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहा था। अभियोजन पक्ष ने अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी जानबूझकर 10 साल से ज्यादा समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा। पकड़े जाने से बचने के लिए अपना हुलिया बदला और उस पर चार अन्य आपराधिक मामले भी चल रहे हैं। उसने आगे तर्क दिया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत सख्त शर्तें उसे जमानत पर रिहा करने से रोकती हैं। कोर्ट ने कहा कि आरोपी एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत दो जरूरी शर्तों को पूरा करने में नाकाम रहा।
कोर्ट ने जांच एजेंसी को आगे की जांच पूरी करने और 60 दिनों के भीतर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के जल्द सुनवाई के अधिकार की रक्षा के लिए यह समय-सीमा जरूरी थी।