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Srinagar News: सफापोरा जमीन अधिग्रहण का दशकों पुराना मामला गांदरबल कोर्ट ने अपने हाथ में लिया

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Srinagar, Safapora Land Aquired, Case, Local Court Take Case
संवाद न्यूज एजेंसी
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श्रीनगर। गांदरबल की एक अदालत ने सफापोरा, सोनवारी में जमीन अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़ा दशकों पुराना एक मामला अपने हाथ में लिया है। यह जमीन मानसबल में नेशनल फिश सीड फार्म बनाने के लिए अधिग्रहित की गई थी।
इस मामले का शीर्षक है अब्दुल रहमान मलिक और अन्य बनाम कलेक्टर, जमीन अधिग्रहण। यह मामला 2002-03 में लगभग 37 कनाल और 9 मरला जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है। इस जमीन के लिए शुरू में मुआवजा 90,000 रुपये प्रति कनाल तय किया गया था। साथ ही 15% अतिरिक्त मुआवजा (सोलैटियम) भी दिया जाना था।
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याचिकाकर्ताओं में सफापोरा के कई निवासी शामिल हैं। उन्होंने इस मुआवजे को चुनौती देते हुए दावा किया कि यह बहुत ही कम और उस समय के बाजार भाव से कहीं नीचे था। उनका कहना था कि उस समय जमीन का बाजार भाव 3.5 लाख से 4 लाख रुपये प्रति कनाल के बीच था।
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सुनवाई के दौरान गांदरबल के प्रधान जिला न्यायाधीश की अदालत ने कई तरह के सबूतों की जांच की जिसमें जमीन मालिकों और सरकारी अधिकारियों के बयान भी शामिल थे। जांच में यह बात सामने आई कि यह जमीन जो मानसबल झील जैसे पर्यटन केंद्र के पास स्थित है न केवल खेती के लिहाज से कीमती थी बल्कि इसमें व्यापार और विकास की भी काफी संभावनाएं थीं।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उनकी पूरी आजीविका इसी अधिग्रहित जमीन पर निर्भर थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीन जबरदस्ती ले ली गई और उचित मुआवजे तथा रोजगार के जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया। गवाहों ने बयान दिया कि उसी दौरान रेलवे परियोजनाओं के लिए किए गए इसी तरह के जमीन अधिग्रहणों में जमीन मालिकों को कहीं ज्यादा मुआवजा मिला था।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों (सरकार) ने दिए गए मुआवजे का बचाव करते हुए कहा कि मुआवजा उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड, उस इलाके में पहले दिए गए मुआवजों और उस समय के बिक्री भाव के आधार पर तय किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि जमीन मालिकों ने शुरुआती चरण में समय रहते कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी।
अदालत ने इस मामले में कई मुख्य मुद्दे तय किए जिनमें मुआवजे की पर्याप्तता, जमीन मालिकों की जमीन पर निर्भरता, अधिग्रहण के समय जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य और रोजगार पाने का अधिकार शामिल थे। इसके साथ ही अदालत ने इस बात की भी जांच की कि क्या यह मामला समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण सुनवाई के योग्य नहीं रह गया है।

यह मामला जिसकी शुरुआत मूल रूप से उच्च न्यायालय के एक निर्देश के बाद हुई थी, जमीन मालिकों के उस लंबे कानूनी संघर्ष को दिखाता है जिसमें वे अपनी संपत्ति के अधिग्रहण के लिए उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। अब सबूतों और कानूनी दलीलों के विस्तृत मूल्यांकन के बाद यह मामला अंतिम फैसले के लिए तैयार है।
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