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Srinagar News: 2016 के यूएपीए मामले में शब्बीर शाह को जमानत
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। एनआईए अधिनियम के तहत बनाई गई विशेष अदालत ने अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को एक दशक पुराने मामले में मंगलवार को जमानत दे दी। यह मामला गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया था।
एडिशनल सेशन जज (टाडा/पोटा) मंजीत राय की अदालत ने जमानत अर्जी मंजूर कर ली। इस एफआईआर में आरपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 121 (भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 506 (आपराधिक धमकी) और यूएपीए की धारा 13 के तहत कई आरोप शामिल हैं। यह मामला 2016 की एक पत्रकार वार्ता से जुड़ा है जिसे कथित तौर पर शाह ने संबोधित किया था। इसमें उन पर जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर सवाल उठाने और आतंकवादियों के लिए जनता से समर्थन मांगने का आरोप है।
अपने आदेश में, अदालत ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी कड़ी रोक इस मामले में लागू नहीं होती। अदालत ने कहा, धारा 43डी(5) की सख्ती सीधे तौर पर लागू नहीं होती। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत अर्जी का मूल्यांकन उन सामान्य सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए जो गैर-जमानती अपराधों पर लागू होते हैं।
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जमानत देने में एक अहम वजह मुकदमे में हुई लंबी देरी थी। एफआईआर 2016 की है जबकि आरोप दिसंबर 2021 में तय किए गए थे। अभियोजन पक्ष के दस गवाहों में से अब तक सिर्फ एक की ही गवाही हुई है। अदालत ने कहा कि शाह काफी समय से हिरासत में हैं और इस देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा, हालांकि अपराध की गंभीरता मायने रखती है लेकिन किसी लंबे समय से चल रहे मुकदमे में जमानत न देने का यह एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
अनुमति लिए बिना दिल्ली छोड़ने पर लगाई रोक
शाह को एक लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही रकम की दो जमानतें देने का निर्देश दिया गया है। उन्हें गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की मनाही है। उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा और दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होना होगा। उन्हें कोर्ट की पहले से अनुमति लिए बिना दिल्ली छोड़ने पर भी रोक लगा दी गई है।
गौरतलब है कि शाह अभी नई दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं जो सीबीआई की ओर से जांच किए जा रहे एक दूसरे मामले से जुड़ा है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की ओर से 72 वर्षीय बीमार अलगाववादी नेता को कथित टेरर फंडिंग और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े एक मामले में जमानत दिए जाने के लगभग चार हफ्ते बाद आया है।
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श्रीनगर। एनआईए अधिनियम के तहत बनाई गई विशेष अदालत ने अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को एक दशक पुराने मामले में मंगलवार को जमानत दे दी। यह मामला गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया था।
एडिशनल सेशन जज (टाडा/पोटा) मंजीत राय की अदालत ने जमानत अर्जी मंजूर कर ली। इस एफआईआर में आरपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 121 (भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 506 (आपराधिक धमकी) और यूएपीए की धारा 13 के तहत कई आरोप शामिल हैं। यह मामला 2016 की एक पत्रकार वार्ता से जुड़ा है जिसे कथित तौर पर शाह ने संबोधित किया था। इसमें उन पर जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर सवाल उठाने और आतंकवादियों के लिए जनता से समर्थन मांगने का आरोप है।
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अपने आदेश में, अदालत ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी कड़ी रोक इस मामले में लागू नहीं होती। अदालत ने कहा, धारा 43डी(5) की सख्ती सीधे तौर पर लागू नहीं होती। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत अर्जी का मूल्यांकन उन सामान्य सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए जो गैर-जमानती अपराधों पर लागू होते हैं।
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जमानत देने में एक अहम वजह मुकदमे में हुई लंबी देरी थी। एफआईआर 2016 की है जबकि आरोप दिसंबर 2021 में तय किए गए थे। अभियोजन पक्ष के दस गवाहों में से अब तक सिर्फ एक की ही गवाही हुई है। अदालत ने कहा कि शाह काफी समय से हिरासत में हैं और इस देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा, हालांकि अपराध की गंभीरता मायने रखती है लेकिन किसी लंबे समय से चल रहे मुकदमे में जमानत न देने का यह एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
अनुमति लिए बिना दिल्ली छोड़ने पर लगाई रोक
शाह को एक लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही रकम की दो जमानतें देने का निर्देश दिया गया है। उन्हें गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की मनाही है। उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा और दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होना होगा। उन्हें कोर्ट की पहले से अनुमति लिए बिना दिल्ली छोड़ने पर भी रोक लगा दी गई है।
गौरतलब है कि शाह अभी नई दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं जो सीबीआई की ओर से जांच किए जा रहे एक दूसरे मामले से जुड़ा है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की ओर से 72 वर्षीय बीमार अलगाववादी नेता को कथित टेरर फंडिंग और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े एक मामले में जमानत दिए जाने के लगभग चार हफ्ते बाद आया है।