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उर्दू भारत की भाषा, इसे फिर से बढ़ावा देने की जरूरत : कर्ण सिंह
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श्रीनगर के एसकेआईसीसी में आयोजित अंतर धार्मिक संवाद कार्यक्रम में डॉ कर्ण सिंह। अमर उजाला
- पूर्व सदर-ए-रियासत ने उर्दू भाषा की महत्ता, कश्मीरियत और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर अपने विचार साझा किए
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। डल झील किनारे स्थित शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में शनिवार को राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद और इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में अंतर-धार्मिक संवाद का आयोजन किया गया। इस दौरान पूर्व सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह ने समाज को जोड़ने के इस मिशन की सराहना की। उन्होंने उर्दू भाषा की महत्ता, कश्मीरियत और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर अपने विचार साझा किए और कहा कि उर्दू कहीं बाहर से नहीं आई है, यह भारत की भाषा है। इसे फिर से बढ़ावा देने की जरूरत है।
अंतर-धार्मिक संवाद में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह के अलावा कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. निलोफर खान, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. ख्वाजा इफ्तिखार अहमद, नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज नई दिल्ली के निदेशक डॉ. मो. शम्स इकबाल, दारा शिकोह सेंटर श्रीनगर की संस्थापक निदेशक डॉ. ज्योत्सना सिंह, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया की ऑपरेशन्स निदेशक डॉ. नसरीन शमा, कश्मीर राइटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष फिदा फिरदौस, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय समन्वयक नवेद-उल-इस्लाम खान, श्रीनगर के एसएसपी डॉ. जीवी संदीप चक्रवर्ती, श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर अक्षय लाबरू, वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य नागरिक और साहित्यकार मौजूद थे।
डॉ. कर्ण सिंह ने एक विशेष सेमिनार में शिरकत करते हुए इंटरफेथ डायलॉग, उर्दू भाषा की महत्ता, कश्मीरियत और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर खुलकर अपने विचार साझा किए। डॉ. सिंह ने इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक सद्भाव की परंपराओं को याद करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। वहीं ऋग्वेद के एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात, सच्चाई (ईश्वर) एक ही है, बस उसे बयां करने और उस तक पहुंचने के रास्ते व तरीके अलग-अलग हैं का भी जिक्र किया।
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उन्होंने कहा, यदि ईश्वर एक है तो महफिल में बैठे अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए अलग-अलग भगवान नहीं हो सकते। जैसे किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंचने के लिए कोई पैदल जा सकता है, कोई कार से जा सकता है तो कोई दूसरे रास्तों से, रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन चोटी (मंजिल) एक ही होती है। इसी तरह इंटरफेथ डायलॉग का मकसद आपस में एक-दूसरे को समझना और सामंजस्य स्थापित करना है, न कि यह बहस करना कि किसका धर्म बेहतर है।
डॉ. कर्ण सिंह ने कश्मीर को हिंदुस्तान का मुकुट बताते हुए महात्मा गांधी के उस कथन को याद किया, जब देश के विभाजन के काले दौर में गांधी जी ने कहा था कि अगर उन्हें कहीं से रोशनी की कोई किरण दिखती है तो वह कश्मीर है। डॉ. सिंह ने आह्वान किया कि हमें उस रोशनी की किरण को अब एक पूरा सूरज बनाना है ताकि पूरा हिंदुस्तान इसका अनुसरण कर सके।
कश्मीरियत, सूफीवाद और इतिहास
कश्मीरियत की अनूठी विरासत पर बात करते हुए कर्ण सिंह ने कहा कि कश्मीर में हमेशा से ही सभी धर्मों के लोग आपसी मोहब्बत और भाईचारे के साथ रहते आए हैं। कश्मीर में पहले वैदिक धर्म था जिसके बाद बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा। सम्राट कनिष्क के काल में हारवन में एक बहुत बड़ी बौद्ध संगीति (मीटिंग) आयोजित की गई थी। इसके बाद कश्मीर में हिंदू पुनरुत्थान हुआ और ''कश्मीर शैविज्म'' (शैव दर्शन) का उदय हुआ जिसमें अभिनवगुप्त जैसे महान विद्वान हुए। इसके साथ ही लल्लेश्वरी (लल द्यद) जैसी संत हुईं जिनके ''ललवाख'' आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
इसके बाद कश्मीर में सूफियों का आगमन हुआ। शाह हमदान अपने साथ 700 लोगों को लेकर यहां आए। शेख नूरुद्दीन नूरानी (नंद ऋषि) जैसे महान संतों ने कश्मीरियत को सींचा जिनकी दरगाह चरार-ए-शरीफ में स्थित है। कश्मीर की सूफी परंपरा में नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। जिस धर्म में नफरत होती है, वह पनप नहीं सकता। आज हमें नफरत की नहीं बल्कि प्रेम और भाईचारे की जरूरत है।
किसी भी भाषा का विरोध करना मां सरस्वती का अपमान करने जैसा
उर्दू को अपनी बेहद खूबसूरत भाषा बताते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि उर्दू शायरी का कोई मुकाबला नहीं है। उन्होंने प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज के साथ बिताए एक पल को याद करते हुए उनकी मशहूर गजल की कुछ पंक्तियां भी गुनगुनाईं। एक समय जम्मू-कश्मीर में उर्दू ही राजकीय भाषा हुआ करती थी, जो कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम बनी। किसी भी भाषा का विरोध करना मां सरस्वती का अपमान करने जैसा है, क्योंकि भाषा से ही इंसानी सभ्यताएं और समाज आगे बढ़े हैं।
कश्मीर की साझी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास : डॉ. ज्योत्सना सिंह
श्रीनगर। दारा शिकोह सेंटर श्रीनगर की संस्थापक निदेशक और डाॅ. कर्ण सिंह की पुत्री डॉ. ज्योत्सना सिंह ने सेंटर की स्थापना के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 में एक गहरी निराशा के माहौल के बीच इस विचार ने जन्म लिया। उस समय मुख्य चिंता यह थी कि उन लोगों से दोबारा कैसे संपर्क साधा जाए जो कश्मीर छोड़कर बाहर चले गए थे और जो लोग यहां रह गए थे, वे उनकी कमी को महसूस कर रहे थे। इसी उद्देश्य के साथ ''दारा शिकोह सेंटर'' की कल्पना की गई।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि दारा शिकोह का यहां पहले एक व्यावसायिक विहार था और बाद में वहां उनकी लाइब्रेरी भी बनी। दारा शिकोह एक ऐसी प्रेरणाशिल्पी शख्सियत थे जिन्होंने न केवल ''इंटरफेथ'' (अंतर-धार्मिक) संवाद की नींव रखी बल्कि उपनिषदों का अनुवाद करवाकर विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दारा शिकोह का मानना था कि हमारी आध्यात्मिक चेतना और रूहानी चीजें अलग नहीं हो सकतीं।
अंतिम सत्य या परमात्मा का स्रोत सभी मजहबों के लिए एक ही है सेंटर की गतिविधियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआत में उन्होंने महिलाओं का एक विशेष समूह बनाया, जिसमें कई क्षेत्रों की महिलाओं ने योगदान दिया। इस अभियान में उन्हें विश्वविद्यालय और विभिन्न कॉलेजों के छात्रों का भी भरपूर सहयोग मिला। एमके रैना के नेतृत्व में थिएटर वर्कशॉप की शुरुआत की गई। इस पहल के जरिए कश्मीर की दम तोड़ती पारंपरिक लोक नाट्य कला ''भांड पाथेर'' को पुनर्जीवित किया गया। इसके कलाकार जो आजीविका के लिए कारपेंटर या मिस्त्री बन चुके थे, उन्हें दोबारा मंच पर लाकर इस विधा को एक नई जान दी गई। उन्होंने प्रोफेसर नीलोफर खान और ख्वाजा साहब का आभार व्यक्त करते हुए खुशी जताई कि कश्मीर की इस साझी और सूफी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम आज भी निरंतर जारी है। ब्यूरो
उर्दू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और दिलों को जोड़ने का माध्यम : प्रो. नीलोफर
श्रीनगर। एसकेआईसीसी में आयोजित अंतर-धार्मिक संवाद को कश्मीर विश्वविद्यालय की उपकुलपति प्रोफेसर नीलोफर खान ने समाज, छात्रों और देश की अखंडता के लिए इस तरह के आयोजनों को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि कश्मीरियत हमेशा से सहिष्णुता, करुणा, समावेशिता और मानवीय गरिमा का प्रतीक रही है। यहांं विभिन्न धर्म और संस्कृतियां एक साथ फली-फूली हैं। अंतर-धार्मिक संवाद केवल अकादमिक चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह आपसी समझ और सामाजिक सद्भाव की नींव है। उर्दू भाषा अपनी समृद्ध साहित्यिक विरासत के कारण हमेशा से सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और दिलों को जोड़ने का माध्यम रही है। इसके माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। कश्मीर विश्वविद्यालय और एनसीपीयूएल के बीच बहुत करीबी संबंध हैं। विश्वविद्यालय छात्रों को अनुसंधान और संवाद के लिए ऐसा मंच प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो उन्हें देश के अन्य हिस्सों से जोड़ सके। बदलते डिजिटल युग में जब युवा तरह-तरह के विचारों के संपर्क में आ रहे हैं, तब उन्हें संवाद और आपसी सम्मान के संस्कार देना बेहद जरूरी है। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को शांति और सद्भाव का दूत बनने के लिए प्रेरित करते हैं। ब्यूरो
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। डल झील किनारे स्थित शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में शनिवार को राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद और इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में अंतर-धार्मिक संवाद का आयोजन किया गया। इस दौरान पूर्व सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह ने समाज को जोड़ने के इस मिशन की सराहना की। उन्होंने उर्दू भाषा की महत्ता, कश्मीरियत और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर अपने विचार साझा किए और कहा कि उर्दू कहीं बाहर से नहीं आई है, यह भारत की भाषा है। इसे फिर से बढ़ावा देने की जरूरत है।
अंतर-धार्मिक संवाद में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह के अलावा कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. निलोफर खान, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. ख्वाजा इफ्तिखार अहमद, नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज नई दिल्ली के निदेशक डॉ. मो. शम्स इकबाल, दारा शिकोह सेंटर श्रीनगर की संस्थापक निदेशक डॉ. ज्योत्सना सिंह, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया की ऑपरेशन्स निदेशक डॉ. नसरीन शमा, कश्मीर राइटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष फिदा फिरदौस, इंटर-फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय समन्वयक नवेद-उल-इस्लाम खान, श्रीनगर के एसएसपी डॉ. जीवी संदीप चक्रवर्ती, श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर अक्षय लाबरू, वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य नागरिक और साहित्यकार मौजूद थे।
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डॉ. कर्ण सिंह ने एक विशेष सेमिनार में शिरकत करते हुए इंटरफेथ डायलॉग, उर्दू भाषा की महत्ता, कश्मीरियत और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर खुलकर अपने विचार साझा किए। डॉ. सिंह ने इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक सद्भाव की परंपराओं को याद करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। वहीं ऋग्वेद के एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात, सच्चाई (ईश्वर) एक ही है, बस उसे बयां करने और उस तक पहुंचने के रास्ते व तरीके अलग-अलग हैं का भी जिक्र किया।
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उन्होंने कहा, यदि ईश्वर एक है तो महफिल में बैठे अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए अलग-अलग भगवान नहीं हो सकते। जैसे किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंचने के लिए कोई पैदल जा सकता है, कोई कार से जा सकता है तो कोई दूसरे रास्तों से, रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन चोटी (मंजिल) एक ही होती है। इसी तरह इंटरफेथ डायलॉग का मकसद आपस में एक-दूसरे को समझना और सामंजस्य स्थापित करना है, न कि यह बहस करना कि किसका धर्म बेहतर है।
डॉ. कर्ण सिंह ने कश्मीर को हिंदुस्तान का मुकुट बताते हुए महात्मा गांधी के उस कथन को याद किया, जब देश के विभाजन के काले दौर में गांधी जी ने कहा था कि अगर उन्हें कहीं से रोशनी की कोई किरण दिखती है तो वह कश्मीर है। डॉ. सिंह ने आह्वान किया कि हमें उस रोशनी की किरण को अब एक पूरा सूरज बनाना है ताकि पूरा हिंदुस्तान इसका अनुसरण कर सके।
कश्मीरियत, सूफीवाद और इतिहास
कश्मीरियत की अनूठी विरासत पर बात करते हुए कर्ण सिंह ने कहा कि कश्मीर में हमेशा से ही सभी धर्मों के लोग आपसी मोहब्बत और भाईचारे के साथ रहते आए हैं। कश्मीर में पहले वैदिक धर्म था जिसके बाद बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा। सम्राट कनिष्क के काल में हारवन में एक बहुत बड़ी बौद्ध संगीति (मीटिंग) आयोजित की गई थी। इसके बाद कश्मीर में हिंदू पुनरुत्थान हुआ और ''कश्मीर शैविज्म'' (शैव दर्शन) का उदय हुआ जिसमें अभिनवगुप्त जैसे महान विद्वान हुए। इसके साथ ही लल्लेश्वरी (लल द्यद) जैसी संत हुईं जिनके ''ललवाख'' आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
इसके बाद कश्मीर में सूफियों का आगमन हुआ। शाह हमदान अपने साथ 700 लोगों को लेकर यहां आए। शेख नूरुद्दीन नूरानी (नंद ऋषि) जैसे महान संतों ने कश्मीरियत को सींचा जिनकी दरगाह चरार-ए-शरीफ में स्थित है। कश्मीर की सूफी परंपरा में नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। जिस धर्म में नफरत होती है, वह पनप नहीं सकता। आज हमें नफरत की नहीं बल्कि प्रेम और भाईचारे की जरूरत है।
किसी भी भाषा का विरोध करना मां सरस्वती का अपमान करने जैसा
उर्दू को अपनी बेहद खूबसूरत भाषा बताते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि उर्दू शायरी का कोई मुकाबला नहीं है। उन्होंने प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज के साथ बिताए एक पल को याद करते हुए उनकी मशहूर गजल की कुछ पंक्तियां भी गुनगुनाईं। एक समय जम्मू-कश्मीर में उर्दू ही राजकीय भाषा हुआ करती थी, जो कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम बनी। किसी भी भाषा का विरोध करना मां सरस्वती का अपमान करने जैसा है, क्योंकि भाषा से ही इंसानी सभ्यताएं और समाज आगे बढ़े हैं।
कश्मीर की साझी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास : डॉ. ज्योत्सना सिंह
श्रीनगर। दारा शिकोह सेंटर श्रीनगर की संस्थापक निदेशक और डाॅ. कर्ण सिंह की पुत्री डॉ. ज्योत्सना सिंह ने सेंटर की स्थापना के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 में एक गहरी निराशा के माहौल के बीच इस विचार ने जन्म लिया। उस समय मुख्य चिंता यह थी कि उन लोगों से दोबारा कैसे संपर्क साधा जाए जो कश्मीर छोड़कर बाहर चले गए थे और जो लोग यहां रह गए थे, वे उनकी कमी को महसूस कर रहे थे। इसी उद्देश्य के साथ ''दारा शिकोह सेंटर'' की कल्पना की गई।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि दारा शिकोह का यहां पहले एक व्यावसायिक विहार था और बाद में वहां उनकी लाइब्रेरी भी बनी। दारा शिकोह एक ऐसी प्रेरणाशिल्पी शख्सियत थे जिन्होंने न केवल ''इंटरफेथ'' (अंतर-धार्मिक) संवाद की नींव रखी बल्कि उपनिषदों का अनुवाद करवाकर विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दारा शिकोह का मानना था कि हमारी आध्यात्मिक चेतना और रूहानी चीजें अलग नहीं हो सकतीं।
अंतिम सत्य या परमात्मा का स्रोत सभी मजहबों के लिए एक ही है सेंटर की गतिविधियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआत में उन्होंने महिलाओं का एक विशेष समूह बनाया, जिसमें कई क्षेत्रों की महिलाओं ने योगदान दिया। इस अभियान में उन्हें विश्वविद्यालय और विभिन्न कॉलेजों के छात्रों का भी भरपूर सहयोग मिला। एमके रैना के नेतृत्व में थिएटर वर्कशॉप की शुरुआत की गई। इस पहल के जरिए कश्मीर की दम तोड़ती पारंपरिक लोक नाट्य कला ''भांड पाथेर'' को पुनर्जीवित किया गया। इसके कलाकार जो आजीविका के लिए कारपेंटर या मिस्त्री बन चुके थे, उन्हें दोबारा मंच पर लाकर इस विधा को एक नई जान दी गई। उन्होंने प्रोफेसर नीलोफर खान और ख्वाजा साहब का आभार व्यक्त करते हुए खुशी जताई कि कश्मीर की इस साझी और सूफी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम आज भी निरंतर जारी है। ब्यूरो
उर्दू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और दिलों को जोड़ने का माध्यम : प्रो. नीलोफर
श्रीनगर। एसकेआईसीसी में आयोजित अंतर-धार्मिक संवाद को कश्मीर विश्वविद्यालय की उपकुलपति प्रोफेसर नीलोफर खान ने समाज, छात्रों और देश की अखंडता के लिए इस तरह के आयोजनों को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि कश्मीरियत हमेशा से सहिष्णुता, करुणा, समावेशिता और मानवीय गरिमा का प्रतीक रही है। यहांं विभिन्न धर्म और संस्कृतियां एक साथ फली-फूली हैं। अंतर-धार्मिक संवाद केवल अकादमिक चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह आपसी समझ और सामाजिक सद्भाव की नींव है। उर्दू भाषा अपनी समृद्ध साहित्यिक विरासत के कारण हमेशा से सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और दिलों को जोड़ने का माध्यम रही है। इसके माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। कश्मीर विश्वविद्यालय और एनसीपीयूएल के बीच बहुत करीबी संबंध हैं। विश्वविद्यालय छात्रों को अनुसंधान और संवाद के लिए ऐसा मंच प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो उन्हें देश के अन्य हिस्सों से जोड़ सके। बदलते डिजिटल युग में जब युवा तरह-तरह के विचारों के संपर्क में आ रहे हैं, तब उन्हें संवाद और आपसी सम्मान के संस्कार देना बेहद जरूरी है। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को शांति और सद्भाव का दूत बनने के लिए प्रेरित करते हैं। ब्यूरो