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Srinagar News: जमानत मिलने से निवारक हिरासत में कोई रुकावट नहीं
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- हाईकोर्ट ने कुलगाम के निवासी के खिलाफ पीएसए आदेश को सही ठहराया
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत कुलगाम के एक निवासी की प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह पाई जाती हैं तो बेल मिलने से अधिकारियों को निवारक हिरासत कानूनों का इस्तेमाल करने से रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने कहा कि एक बार जब अधिकारी ने जमानत आदेश पर गौर कर लिया हो और फिर भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की गतिविधियां नुकसानदेह पाई हों तो प्रतिवादियों द्वारा बेल आदेश को चुनौती न देने से हिरासत गैर-कानूनी नहीं हो जाएगी। बेंच ने ओदुरा कुलगाम के नजीर अहमद चक की ओर से दायर उस याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही जिसमें उन्होंने पीएसए के तहत अपनी हिरासत को चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और किसी आपराधिक मामले में बरी होना या जमानत मिलना, अपने आप में सक्षम अधिकारी को निवारक हिरासत का आदेश पारित करने से नहीं रोकता है। यदि अधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत कुलगाम के एक निवासी की प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह पाई जाती हैं तो बेल मिलने से अधिकारियों को निवारक हिरासत कानूनों का इस्तेमाल करने से रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने कहा कि एक बार जब अधिकारी ने जमानत आदेश पर गौर कर लिया हो और फिर भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की गतिविधियां नुकसानदेह पाई हों तो प्रतिवादियों द्वारा बेल आदेश को चुनौती न देने से हिरासत गैर-कानूनी नहीं हो जाएगी। बेंच ने ओदुरा कुलगाम के नजीर अहमद चक की ओर से दायर उस याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही जिसमें उन्होंने पीएसए के तहत अपनी हिरासत को चुनौती दी थी।
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अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और किसी आपराधिक मामले में बरी होना या जमानत मिलना, अपने आप में सक्षम अधिकारी को निवारक हिरासत का आदेश पारित करने से नहीं रोकता है। यदि अधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक हैं।
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