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असुरक्षित दूध का बच्चों के स्वास्थ्य पर ‘अपरिवर्तनीय’ प्रभाव पड़ सकता है : हाईकोर्ट

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Srinagar, Highcourt, Issue Order, Insecure Milk
- गुजरात के सप्लायर के खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द करने से इन्कार
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। यह देखते हुए कि दूषित दूध उत्पादों का इंसानी सेहत पर खासकर बच्चों पर गंभीर और न भरपाई होने वाला असर हो सकता है, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने गुजरात की एक दूध उत्पादक सहकारी संस्था के प्रतिनिधियों के खिलाफ कथित तौर पर असुरक्षित दूध के एक सैंपल को लेकर चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने से इन्कार कर दिया है।
जस्टिस वसीम सादिक नरगल की बेंच ने कहा, कोर्ट इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि जन-स्वास्थ्य सबसे ज्यादा जरूरी है और इसे निजी व्यापारिक हितों से ऊपर रखा जाना चाहिए। यह मामला दूध की सुरक्षा से जुड़ा है जिसका सेवन हर दिन बच्चे, शिशु, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, मरीज और आम लोग करते हैं।
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बेंच ने गुजरात की मेसर्स बनासकांठा डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड के प्रतिनिधियों द्वारा दायर एक याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही। इस याचिका में शोपियां के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने लंबित एक शिकायत और 7 अक्टूबर, 2021 के संज्ञान आदेश को चुनौती दी गई थी।
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दूषित दूध उत्पाद में इंसानी सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित करने की क्षमता होती है और इससे लंबे समय तक रहने वाले और न भरपाई होने वाले परिणाम हो सकते हैं, खासकर उन बच्चों पर जिनकी शारीरिक वृद्धि और रोग-प्रतिरोधक क्षमता सुरक्षित और पौष्टिक भोजन पर निर्भर करती है। इसलिए, खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को हल्के में नहीं लिया जा सकता और न ही केवल तकनीकी आधार पर उनका फैसला किया जा सकता है।
बेंच ने कहा कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 को इंसानी उपभोग के लिए सुरक्षित और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करने और जनता को असुरक्षित खाद्य पदार्थों से बचाने के लिए बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि जन-स्वास्थ्य को बनाए रखना और उसमें सुधार करना केवल एक प्रशासनिक चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह सर्वोच्च महत्व का एक संवैधानिक दायित्व है।

यह मानते हुए कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम की धारा 59 के तहत दंडनीय अपराधों का होना दर्शाती है, अदालत ने याचिका खारिज कर दी और शोपियां के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे मुकदमे की कार्यवाही तेजी से आगे बढ़ाएं और अधिमानतः इसे छह महीने के भीतर पूरा करें।
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