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आपराधिक अदालतें जांच करें कि क्या मामला ट्रायल के लिए सही है : हाईकोर्ट

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Srinagar, Highcourt, Gave Orders, Crime Courts
- बेंच ने कहा कि ये मामले पहले से ही बोझ से दबी अदालतों पर अनावश्यक बोझ डालते हैं
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संवाद न्यूज एजेंसी

श्रीनगर। जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि आपराधिक अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे चार्जशीट दाखिल करने के स्टेज से ही सक्रिय रहें, निष्क्रिय नहीं। वह न्यायिक जांच करें कि क्या कोई मामला ट्रायल के लिए सही है।

जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने कहा कि यह एक आपराधिक अदालत का कर्तव्य है कि वह शुरुआत में ही जांच करे कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा रखा गया तथ्यात्मक ढांचा आरोपों को तय करने के लिए पूरा और पर्याप्त है। क्या मामला तथ्यात्मक रूप से टूटा हुआ है जिसका मकसद सिर्फ़ किसी आरोपी को असली अभियोजन के बजाय उत्पीड़न के लिए फंसाना है।
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प्रणालीगत चिंताओं पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे गलत तरीके से सोचे गए आपराधिक मामलों को स्वीकार करना आपराधिक न्याय वितरण की धीमी गति के पीछे एक बड़ा कारण है। बेंच ने कहा कि ये मामले पहले से ही बोझ से दबी अदालतों पर अनावश्यक बोझ डालते हैं और सालों तक चलते रहते हैं, जब तक कि आरोपी हाई कोर्ट में अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने के लिए संपर्क नहीं करता, या ट्रायल कोर्ट खुद चार्ज तय करने के स्टेज पर मामले को खारिज करने के लिए अपनी न्यायिक समझ का इस्तेमाल नहीं करता।
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हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रायल अदालतों द्वारा शुरुआती और कड़ी जांच आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोक सकती है और यह सुनिश्चित करके कीमती न्यायिक समय बचा सकती है कि बिना योग्यता वाले अभियोजन को शुरुआत में ही फिल्टर कर दिया जाए।

कोर्ट ने ये टिप्पणियां अचबल पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अनंतनाग के समक्ष लंबित परिणामी सत्र ट्रायल को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं।

यह मामला 17 सितंबर 2015 को एक व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसकी बेटी को याचिकाकर्ता ने यौन शोषण के लिए जबरन अगवा कर लिया था। इसी आधार पर कानून की संबंधित धारा के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

हालांकि जांच के दौरान पीड़िता को एक दिन के भीतर बरामद कर लिया गया। उसकी मेडिकल जांच की गई और उसकी उम्र 20 साल पाई गई जो उसके पिता के इस दावे के विपरीत थी कि वह 16-17 साल की नाबालिग थी। मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी यौन उत्पीड़न की बात से इन्कार किया गया।

एक मजिस्ट्रेट के सामने और बाद में हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण कार्यवाही में अपने बयान में महिला ने साफ तौर पर कहा कि उसने सनी कश्यप से अपनी मर्जी से शादी की थी। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि हेबियस कॉर्पस की कार्यवाही और महिला के शादी कबूल करने और किसी भी अपराध से इन्कार करने वाले बयान की पूरी जानकारी होने के बावजूद पुलिस ने छह साल से ज्यादा समय बाद दायर की गई फाइनल पुलिस रिपोर्ट में जानबूझकर इन तथ्यों को छिपाया।
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