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Srinagar News: यौम-ए-आशूरा पर काले कुर्ते और स्कार्फ में शोक संतप्त लोगों के बीच पहुंचे सीएम
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श्रीनगर में मुहर्रम के जुलूस के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला। संवाद
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- अकीदतमंदों के बीच बांटे जलपान और पुराने रूट की बहाली का जताया भरोसा
- इमाम हुसैन के बलिदान को किया याद
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को यौम-ए-आशूरा के पवित्र अवसर पर श्रीनगर के जडीबल इलाके में पहुंचकर शिया अकीदतमंदों के पारंपरिक जुलूस में भाग लिया। मुख्यमंत्री ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) द्वारा लगाए गए एक स्टाल (सबील) पर लोगों के बीच पानी और दूध का वितरण किया। काले कुर्ते-शलवार और गले में किफायह (पारंपरिक स्कार्फ) पहने मुख्यमंत्री ने शोक संतप्त लोगों के प्रति अपनी गहरी संवेदना और एकजुटता प्रकट की। इस दौरान उनके साथ उनके सलाहकार नासिर असलम वानी और जडीबल के स्थानीय विधायक तनवीर सादिक भी मौजूद रहे।
इस दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जुलूस में शामिल अकीदतमंदों और व्यवस्थाओं में जुटे स्वयंसेवकों से बातचीत की। उन्होंने सबीलों पर सेवा दे रहे युवाओं के सेवा भाव और समर्पण की जमकर सराहना की। कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन, उनके परिवार और वफादार साथियों के सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए उमर अब्दुल्ला ने संवाददाताओं से कहा कि हम सभी आशूरा के महत्व को अच्छी तरह जानते हैं। हम सब हजरत इमाम हुसैन के बलिदान और उससे मिलने वाली सीख को याद रखते हैं। जब लोग उन सबकों और आदर्शों को भूल जाते हैं, तो समाज में तबाही और बर्बादी का दौर शुरू हो जाता है।
मुख्यमंत्री ने मुहर्रम के पारंपरिक रास्तों पर जुलूस निकालने को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं जब आशूरा का यह ऐतिहासिक जुलूस अपने पुराने और मूल रूट पर वापस लौटेगा। मुख्यमंत्री ने जडीबल में स्थित प्रसिद्ध और सूफी संत मीर शम्स-उद-दीन अराकी (रहमतुल्लाह अलैह) की दरगाह पर हाजिरी दी। वहां उन्होंने पूरी अकीदत के साथ फातिहा पढ़ी और जम्मू-कश्मीर की सुख-समृद्धि, तरक्की, शांति और आपसी भाईचारे के लिए दुआ मांगी।
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- इमाम हुसैन के बलिदान को किया याद
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को यौम-ए-आशूरा के पवित्र अवसर पर श्रीनगर के जडीबल इलाके में पहुंचकर शिया अकीदतमंदों के पारंपरिक जुलूस में भाग लिया। मुख्यमंत्री ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) द्वारा लगाए गए एक स्टाल (सबील) पर लोगों के बीच पानी और दूध का वितरण किया। काले कुर्ते-शलवार और गले में किफायह (पारंपरिक स्कार्फ) पहने मुख्यमंत्री ने शोक संतप्त लोगों के प्रति अपनी गहरी संवेदना और एकजुटता प्रकट की। इस दौरान उनके साथ उनके सलाहकार नासिर असलम वानी और जडीबल के स्थानीय विधायक तनवीर सादिक भी मौजूद रहे।
इस दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जुलूस में शामिल अकीदतमंदों और व्यवस्थाओं में जुटे स्वयंसेवकों से बातचीत की। उन्होंने सबीलों पर सेवा दे रहे युवाओं के सेवा भाव और समर्पण की जमकर सराहना की। कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन, उनके परिवार और वफादार साथियों के सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए उमर अब्दुल्ला ने संवाददाताओं से कहा कि हम सभी आशूरा के महत्व को अच्छी तरह जानते हैं। हम सब हजरत इमाम हुसैन के बलिदान और उससे मिलने वाली सीख को याद रखते हैं। जब लोग उन सबकों और आदर्शों को भूल जाते हैं, तो समाज में तबाही और बर्बादी का दौर शुरू हो जाता है।
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मुख्यमंत्री ने मुहर्रम के पारंपरिक रास्तों पर जुलूस निकालने को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं जब आशूरा का यह ऐतिहासिक जुलूस अपने पुराने और मूल रूट पर वापस लौटेगा। मुख्यमंत्री ने जडीबल में स्थित प्रसिद्ध और सूफी संत मीर शम्स-उद-दीन अराकी (रहमतुल्लाह अलैह) की दरगाह पर हाजिरी दी। वहां उन्होंने पूरी अकीदत के साथ फातिहा पढ़ी और जम्मू-कश्मीर की सुख-समृद्धि, तरक्की, शांति और आपसी भाईचारे के लिए दुआ मांगी।
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