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Srinagar News: .झीलों के गायब होने पर एनजीटी के दखल का भाजपा ने किया स्वागत
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अल्ताफ ठाकुर ने एनसी सरकार पर लगाए लापरवाही के आरोप
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू कश्मीर में झीलों के तेजी से घटने के मुद्दे पर भाजपा के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ओर से स्वत संज्ञान लेने के फैसले का स्वागत भी किया है। इसे उन्होंने जवाबदेही तय करने की दिशा में जरूरी और समय पर उठाया गया कदम बताया है।
ठाकुर ने कहा कि यह मामला अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा है। यह प्रशासनिक लापरवाही और नीतिगत विफलता का भी उदाहरण बन गया है। उन्होंने कहा कि यह दखल सभी संबंधित विभागों के लिए चेतावनी है। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार सरकारों ने झीलों और जल स्रोतों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। इसके साथ ही बागवानी, कृषि और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
उन्होंनेे कहा कि मौजूदा स्थिति वर्षों की लापरवाही का नतीजा है। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट योजना और दूरदर्शिता की कमी रही है, जिसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। अल्ताफ ने सीएजी की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में जम्मू कश्मीर की करीब 74 प्रतिशत झीलें या तो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं या काफी सिकुड़ गई हैं।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल 697 झीलों में से 518 झीलों पर गंभीर असर पड़ा है। इनमें से 315 झीलें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं, जिनका जल क्षेत्र 1537 एकड़ से अधिक था। वहीं 203 झीलों का क्षेत्रफल 1314 हेक्टेयर से ज्यादा घट गया है।
एनजीटी ने इस रिपोर्ट के आधार पर सख्त संज्ञान लिया है। ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता प्रकाश श्रीवास्तव कर रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद भी इसमें शामिल हैं।
ठाकुर ने कहा कि यह स्थिति केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए खतरा है। उन्होंने कहा कि झीलों के खत्म होने से बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा जैव विविधता को नुकसान होता है और स्थानीय लोगों की आजीविका भी प्रभावित होती है।
उन्होंने 2014 की विनाशकारी बाढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि जल स्रोतों के सिकुड़ने से प्राकृतिक संतुलन कमजोर हो जाता है। इससे आपदा की स्थिति में नुकसान बढ़ सकता है। ठाकुर ने कहा कि झीलें केवल पानी के स्रोत नहीं हैं। ये जलवायु संतुलन बनाए रखने, खेती को सहारा देने, भूजल रिचार्ज करने और जैव विविधता को बचाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने कहा कि अभी केवल कुछ बड़ी झीलों पर ही प्रबंधन योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें डल, वुलर, होकर्सर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर झील शामिल हैं। सैकड़ों छोटी लेकिन महत्वपूर्ण झीलों की अनदेखी की जा रही है। सरकार से इस दिशा में ठोस और समन्वित कदम उठाने की मांग करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसमें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम, जल अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम शामिल हैं।
ठाकुर ने वैज्ञानिक तरीके से झीलों की मैपिंग, नियमित निगरानी और आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों के बिना जल स्रोतों को बचाना संभव नहीं है। एनजीटी की कार्रवाई का असर जमीन पर दिखना चाहिए। इसके लिए बेहतर प्रशासन, जवाबदेही और जनभागीदारी जरूरी है।
कई विभागों को नोटिस जारी किए गए हैं
ट्रिब्यूनल ने इस मामले में कई विभागों को नोटिस जारी किए हैं। इनमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जम्मू कश्मीर वेटलैंड अथॉरिटी और प्रदूषण नियंत्रण समिति समेत अन्य विभाग शामिल हैं। सभी से विस्तृत जवाब मांगा गया है। फिलहाल इस मामले की अगली सुनवाई 15 मई को निर्धारित की गई है। ठाकुर ने उम्मीद जताई कि यह कदम जम्मू कश्मीर में पर्यावरण सुधार की दिशा में एक अहम मोड़ साबित होगा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि पिछली गलतियों को सुधारा जाए और क्षेत्र के पर्यावरण को सुरक्षित किया जाए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू कश्मीर में झीलों के तेजी से घटने के मुद्दे पर भाजपा के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ओर से स्वत संज्ञान लेने के फैसले का स्वागत भी किया है। इसे उन्होंने जवाबदेही तय करने की दिशा में जरूरी और समय पर उठाया गया कदम बताया है।
ठाकुर ने कहा कि यह मामला अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा है। यह प्रशासनिक लापरवाही और नीतिगत विफलता का भी उदाहरण बन गया है। उन्होंने कहा कि यह दखल सभी संबंधित विभागों के लिए चेतावनी है। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार सरकारों ने झीलों और जल स्रोतों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। इसके साथ ही बागवानी, कृषि और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
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उन्होंनेे कहा कि मौजूदा स्थिति वर्षों की लापरवाही का नतीजा है। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट योजना और दूरदर्शिता की कमी रही है, जिसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। अल्ताफ ने सीएजी की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में जम्मू कश्मीर की करीब 74 प्रतिशत झीलें या तो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं या काफी सिकुड़ गई हैं।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल 697 झीलों में से 518 झीलों पर गंभीर असर पड़ा है। इनमें से 315 झीलें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं, जिनका जल क्षेत्र 1537 एकड़ से अधिक था। वहीं 203 झीलों का क्षेत्रफल 1314 हेक्टेयर से ज्यादा घट गया है।
एनजीटी ने इस रिपोर्ट के आधार पर सख्त संज्ञान लिया है। ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता प्रकाश श्रीवास्तव कर रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद भी इसमें शामिल हैं।
ठाकुर ने कहा कि यह स्थिति केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए खतरा है। उन्होंने कहा कि झीलों के खत्म होने से बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा जैव विविधता को नुकसान होता है और स्थानीय लोगों की आजीविका भी प्रभावित होती है।
उन्होंने 2014 की विनाशकारी बाढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि जल स्रोतों के सिकुड़ने से प्राकृतिक संतुलन कमजोर हो जाता है। इससे आपदा की स्थिति में नुकसान बढ़ सकता है। ठाकुर ने कहा कि झीलें केवल पानी के स्रोत नहीं हैं। ये जलवायु संतुलन बनाए रखने, खेती को सहारा देने, भूजल रिचार्ज करने और जैव विविधता को बचाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने कहा कि अभी केवल कुछ बड़ी झीलों पर ही प्रबंधन योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें डल, वुलर, होकर्सर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर झील शामिल हैं। सैकड़ों छोटी लेकिन महत्वपूर्ण झीलों की अनदेखी की जा रही है। सरकार से इस दिशा में ठोस और समन्वित कदम उठाने की मांग करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसमें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम, जल अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम शामिल हैं।
ठाकुर ने वैज्ञानिक तरीके से झीलों की मैपिंग, नियमित निगरानी और आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों के बिना जल स्रोतों को बचाना संभव नहीं है। एनजीटी की कार्रवाई का असर जमीन पर दिखना चाहिए। इसके लिए बेहतर प्रशासन, जवाबदेही और जनभागीदारी जरूरी है।
कई विभागों को नोटिस जारी किए गए हैं
ट्रिब्यूनल ने इस मामले में कई विभागों को नोटिस जारी किए हैं। इनमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जम्मू कश्मीर वेटलैंड अथॉरिटी और प्रदूषण नियंत्रण समिति समेत अन्य विभाग शामिल हैं। सभी से विस्तृत जवाब मांगा गया है। फिलहाल इस मामले की अगली सुनवाई 15 मई को निर्धारित की गई है। ठाकुर ने उम्मीद जताई कि यह कदम जम्मू कश्मीर में पर्यावरण सुधार की दिशा में एक अहम मोड़ साबित होगा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि पिछली गलतियों को सुधारा जाए और क्षेत्र के पर्यावरण को सुरक्षित किया जाए।