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Srinagar News: कश्मीर के सेब उद्योग को मिलेगा बड़ा संबल, सोपोर फ्रूट मंडी से निजी वित्तीय सुरक्षा की नई शुरुआत
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- बेमौसम मार और हाईवे के जोखिमों से राहत की उम्मीद
अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब उद्योग से जुड़े किसानों, व्यापारियों और आढ़तियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। वित्तीय और बीमा सेवा क्षेत्र की एक कंपनी ने कश्मीर के बागवानी क्षेत्र में आधिकारिक प्रवेश करते हुए एशिया की दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी सोपोर फ्रूट मंडी से अपनी सेवाओं की शुरुआत की है।
इस कदम से घाटी के बागवानों और कारोबारियों में उम्मीद जगी है कि दशकों से मौसम की अनिश्चितताओं और परिवहन के दौरान होने वाले भारी आर्थिक नुकसान से अब उन्हें जरूरी सुरक्षा कवच मिल सकेगा।
उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले में स्थित सोपोर फ्रूट मंडी जम्मू-कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था का मुख्य केंद्र है। दिल्ली की आजादपुर मंडी के बाद एशिया की दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी का दर्जा रखने वाली सोपोर मंडी से हर साल लगभग 2,500 से 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का सेब और ताजे फलों का कारोबार होता है। यहां से सालाना करोड़ों पेटियां देश की विभिन्न बड़ी मंडियों में भेजी जाती हैं। इतने बड़े पैमाने पर व्यापार होने के बावजूद यह क्षेत्र हमेशा से प्राकृतिक आपदाओं, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि और लॉजिस्टिक्स की अनिश्चितताओं के कारण गहरे वित्तीय जोखिमों के बीच काम करता रहा है।
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घाटी के बागवानों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और अप्रत्याशित मौसम के चलते हर साल उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। जिले के पट्टन के एक सेब उत्पादक मुश्ताक अहमद वाजा ने अपनी चिंता साझा करते हुए कहा, ''मौसम की मार हम हर साल झेलते रहे हैं। कभी असमय बर्फबारी तो कभी ओलावृष्टि से पूरी फसल तबाह हो जाती है और किसान कर्ज में डूब जाता है। अगर यह कंपनी हमें फसल और मौसम के नुकसान पर पारदर्शी बीमा कवर मुहैया कराती है, तो सेब किसानों के लिए इससे बड़ी राहत की बात कुछ नहीं हो सकती।''''
वहीं, सोपोर के एक अन्य किसान फरहत नजीर ने सरकारी नीतियों और जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करते हुए कहा, ''सरकार से बार-बार गुहार लगाई जाती रही है कि व्यापक कृषि बीमा योजना का वास्तविक लाभ सेब उद्योग और बागवानों को भी मिले, लेकिन सालों से केवल आश्वासन ही मिलते रहे हैं। जमीनी स्तर पर किसानों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ और हर सीजन में लाखों रुपये का नुकसान अपनी जेब से भरना पड़ा। अब निजी स्तर पर इस तरह के वित्तीय सुरक्षा तंत्र के आने से यह उम्मीद बंधी है कि शायद किसानों की आर्थिक बर्बादी रुकेगी।''
बागवानों के अलावा मंडी के आढ़ती और व्यापारी भी इस पहल को अपने व्यवसाय के लिए बेहद अहम मान रहे हैं। सोपोर फ्रूट मंडी के आढ़ती बशीर अहमद ने फल ढुलाई के दौरान आने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा, ''जो फल मौसम की मार से बच भी जाता था, उसका सबसे बड़ा जोखिम श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) पर बना रहता है। हाईवे पर भूस्खलन या जाम के चलते गाड़ियां कई-कई दिन फंसी रहती हैं, जिससे सेब गाड़ियों में ही सड़ जाता था और व्यापारियों को भारी घाटा उठाना पड़ता था। कंपनी की ओर से परिवहन के दौरान भी बीमा सुरक्षा का जो भरोसा दिलाया गया है, उससे कारोबारियों में काफी उम्मीदें जगी हैं।''
व्यापारिक संगठनों का मानना है कि यदि बीमा और वित्तीय सुरक्षा नीतियां बिना किसी जटिल कागजी दांव-पेंच के समय पर लागू होती हैं, तो इससे स्थानीय मंडियों का ढांचागत आधार मजबूत होगा। इससे न केवल किसानों को अपनी लागत की गारंटी मिलेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के सेब व्यापार को भी वित्तीय स्थिरता हासिल होगी।
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब उद्योग से जुड़े किसानों, व्यापारियों और आढ़तियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। वित्तीय और बीमा सेवा क्षेत्र की एक कंपनी ने कश्मीर के बागवानी क्षेत्र में आधिकारिक प्रवेश करते हुए एशिया की दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी सोपोर फ्रूट मंडी से अपनी सेवाओं की शुरुआत की है।
इस कदम से घाटी के बागवानों और कारोबारियों में उम्मीद जगी है कि दशकों से मौसम की अनिश्चितताओं और परिवहन के दौरान होने वाले भारी आर्थिक नुकसान से अब उन्हें जरूरी सुरक्षा कवच मिल सकेगा।
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उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले में स्थित सोपोर फ्रूट मंडी जम्मू-कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था का मुख्य केंद्र है। दिल्ली की आजादपुर मंडी के बाद एशिया की दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी का दर्जा रखने वाली सोपोर मंडी से हर साल लगभग 2,500 से 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का सेब और ताजे फलों का कारोबार होता है। यहां से सालाना करोड़ों पेटियां देश की विभिन्न बड़ी मंडियों में भेजी जाती हैं। इतने बड़े पैमाने पर व्यापार होने के बावजूद यह क्षेत्र हमेशा से प्राकृतिक आपदाओं, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि और लॉजिस्टिक्स की अनिश्चितताओं के कारण गहरे वित्तीय जोखिमों के बीच काम करता रहा है।
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घाटी के बागवानों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और अप्रत्याशित मौसम के चलते हर साल उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। जिले के पट्टन के एक सेब उत्पादक मुश्ताक अहमद वाजा ने अपनी चिंता साझा करते हुए कहा, ''मौसम की मार हम हर साल झेलते रहे हैं। कभी असमय बर्फबारी तो कभी ओलावृष्टि से पूरी फसल तबाह हो जाती है और किसान कर्ज में डूब जाता है। अगर यह कंपनी हमें फसल और मौसम के नुकसान पर पारदर्शी बीमा कवर मुहैया कराती है, तो सेब किसानों के लिए इससे बड़ी राहत की बात कुछ नहीं हो सकती।''''
वहीं, सोपोर के एक अन्य किसान फरहत नजीर ने सरकारी नीतियों और जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करते हुए कहा, ''सरकार से बार-बार गुहार लगाई जाती रही है कि व्यापक कृषि बीमा योजना का वास्तविक लाभ सेब उद्योग और बागवानों को भी मिले, लेकिन सालों से केवल आश्वासन ही मिलते रहे हैं। जमीनी स्तर पर किसानों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ और हर सीजन में लाखों रुपये का नुकसान अपनी जेब से भरना पड़ा। अब निजी स्तर पर इस तरह के वित्तीय सुरक्षा तंत्र के आने से यह उम्मीद बंधी है कि शायद किसानों की आर्थिक बर्बादी रुकेगी।''
बागवानों के अलावा मंडी के आढ़ती और व्यापारी भी इस पहल को अपने व्यवसाय के लिए बेहद अहम मान रहे हैं। सोपोर फ्रूट मंडी के आढ़ती बशीर अहमद ने फल ढुलाई के दौरान आने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा, ''जो फल मौसम की मार से बच भी जाता था, उसका सबसे बड़ा जोखिम श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) पर बना रहता है। हाईवे पर भूस्खलन या जाम के चलते गाड़ियां कई-कई दिन फंसी रहती हैं, जिससे सेब गाड़ियों में ही सड़ जाता था और व्यापारियों को भारी घाटा उठाना पड़ता था। कंपनी की ओर से परिवहन के दौरान भी बीमा सुरक्षा का जो भरोसा दिलाया गया है, उससे कारोबारियों में काफी उम्मीदें जगी हैं।''
व्यापारिक संगठनों का मानना है कि यदि बीमा और वित्तीय सुरक्षा नीतियां बिना किसी जटिल कागजी दांव-पेंच के समय पर लागू होती हैं, तो इससे स्थानीय मंडियों का ढांचागत आधार मजबूत होगा। इससे न केवल किसानों को अपनी लागत की गारंटी मिलेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के सेब व्यापार को भी वित्तीय स्थिरता हासिल होगी।