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Srinagar News: आईसीएआर ने लद्दाख विवि को सौंपा चार केवीके का प्रशासनिक नियंत्रण
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लेह। लद्दाख के शीत-मरुस्थलीय क्षेत्र में कृषि विस्तार को मजबूत बनाने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने लद्दाख विश्वविद्यालय के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत चार कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) का प्रशासनिक नियंत्रण केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान को सौंपा गया है।
यह समझौता नई दिल्ली में आईसीएआर के उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजबीर सिंह और लद्दाख विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर साकेत खुशवाहा की तरफ से हस्ताक्षरित किया गया। लेह-I, लेह-II (न्योमा), कारगिल-I और कारगिल-II (जंंस्कार) स्थित केवीके अब सीधे विश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण में कार्य करेंगे। इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें रजिस्ट्रार (प्रभारी) नावांग टुंडुप और डीन डॉ. मोहम्मद रफी भी शामिल थे।
यह कदम श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तहत पूर्व प्रशासनिक व्यवस्था से अलग एक बदलाव को दर्शाता है। इसे लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुनर्गठन के बाद उसकी विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप कृषि विस्तार सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
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अधिकारियों ने बताया कि इस परिवर्तन से शोध संस्थानों और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होने की उम्मीद है, क्योंकि विस्तार सेवाएं अब क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के माध्यम से संचालित होंगी। लेह और कारगिल में परिसरों के साथ, लद्दाख विश्वविद्यालय से अपेक्षा है कि वह शैक्षणिक शोध को किसानों की व्यावहारिक आवश्यकताओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ सकेगा।
प्रशासन का मानना है कि इस एकीकरण से कम खेती अवधि, सीमित जल उपलब्धता और नाजुक मिट्टी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप संभव होंगे। साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए कृषि-उद्यमिता और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। लद्दाख विश्वविद्यालय ने इस समझौते को सुगम बनाने में केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
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यह समझौता नई दिल्ली में आईसीएआर के उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजबीर सिंह और लद्दाख विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर साकेत खुशवाहा की तरफ से हस्ताक्षरित किया गया। लेह-I, लेह-II (न्योमा), कारगिल-I और कारगिल-II (जंंस्कार) स्थित केवीके अब सीधे विश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण में कार्य करेंगे। इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें रजिस्ट्रार (प्रभारी) नावांग टुंडुप और डीन डॉ. मोहम्मद रफी भी शामिल थे।
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यह कदम श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तहत पूर्व प्रशासनिक व्यवस्था से अलग एक बदलाव को दर्शाता है। इसे लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुनर्गठन के बाद उसकी विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप कृषि विस्तार सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
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अधिकारियों ने बताया कि इस परिवर्तन से शोध संस्थानों और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होने की उम्मीद है, क्योंकि विस्तार सेवाएं अब क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के माध्यम से संचालित होंगी। लेह और कारगिल में परिसरों के साथ, लद्दाख विश्वविद्यालय से अपेक्षा है कि वह शैक्षणिक शोध को किसानों की व्यावहारिक आवश्यकताओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ सकेगा।
प्रशासन का मानना है कि इस एकीकरण से कम खेती अवधि, सीमित जल उपलब्धता और नाजुक मिट्टी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप संभव होंगे। साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए कृषि-उद्यमिता और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। लद्दाख विश्वविद्यालय ने इस समझौते को सुगम बनाने में केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।