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Srinagar News: छात्र की हत्या के आरोपों से तीन लोगों को बरी किए जाने के खिलाफ अपील खारिज

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jammu kashmir news
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने वीरवार को 2011 के पुलवामा हमले के मामले में तीन आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ सरकार की अपील खारिज कर दी। ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को बरकरार रखा। पुलवामा के प्रधान सत्र न्यायाधीश ने 9 मई, 2015 को नजीर अहमद गनी को गैर-इरादतन हत्या के तहत दोषी ठहराया था। दो अन्य व्यक्तियों गुलाम गनी और मकबूल गनी को 16 अगस्त 2011 को एक छात्र दानिश फारूक उर्फ उमर फारूक की मौत के मामले में दोषी ठहराया गया था।
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यह मौत लाठियों से किए गए हमले के बाद हुई थी। हालांकि इन तीनों को ही आरपीसी की धारा 302 के तहत लगाए गए आरोप से बरी कर दिया गया था। सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजीव कुमार और संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने यह फैसला दिया कि अभियोजन पक्ष आरपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मामला साबित करने में विफल रहा है।
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कोर्ट ने नजीर अहमद गनी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और यह टिप्पणी की कि यह कृत्य आपराधिक मानव वध की श्रेणी में आता है न कि हत्या की श्रेणी में क्योंकि इसमें जान लेने का कोई इरादा नहीं था।
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बैंच ने यह पाया कि मृतक को सिर पर एक ही चोट लगी थी जो किसी कुंद वस्तु से लगी थी। इसमें न तो कोई फ्रैक्चर था और न ही कोई गंभीर आंतरिक क्षति। बेंच ने यह भी पाया कि यह घटना सीमा विवाद को लेकर हुई अचानक की कहा-सुनी का नतीजा थी और इसमें किसी भी तरह की पूर्व-नियोजित साजिश का कोई सबूत नहीं मिला। अदालत ने अन्य दो आरोपियों की दोषसिद्धि को भी आरपीसी की धारा 323 के तहत बरकरार रखा। यह देखते हुए कि उनकी भूमिका केवल मुक्कों और लातों से मामूली चोटें पहुंचाने तक ही सीमित थी।

इस बात पर जोर देते हुए कहा कि अपीलीय अदालतों को बरी किए जाने के मामलों में तब तक दखल नहीं देना चाहिए जब तक कि निष्कर्ष पूरी तरह से गलत न हों। बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कमी नहीं पाई। बेंच ने आगे यह भी कहा कि नजीर अहमद गनी की सजा पहले की कार्यवाही में ही सही ठहराई जा चुकी थी और सभी आरोपियों ने अपनी सजा पूरी कर ली है। इसलिए अपील खारिज कर दी गई और ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया गया।
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