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कश्मीर में उग्रवाद अब लगभग न के बराबर: हाईकोर्ट
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि कश्मीर घाटी में अब उग्रवाद यानी आतंकवाद लगभग न के बराबर है और 1990 के दशक के मुकाबले अब जमीनी स्थिति में बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ चुका है। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने एक चेक बाउंस मामले को श्रीनगर की अदालत से जम्मू ट्रांसफर करने की मांग करने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह भी कहा कि कश्मीर के सभी राजनीतिक कार्यकर्ता घाटी में वापस लौट चुके हैं और पिछले कई वर्षों के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक व चुनावी प्रक्रियाओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। ऐसे में याचिकाकर्ता का यह दावा पूरी तरह से असंभव और अविश्वसनीय लगता है कि कश्मीर जाने पर उसकी जान को अभी भी खतरा है।
उच्च न्यायालय ने यह फैसला सोनाउल्लाह डार नामक व्यक्ति की ट्रांसफर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने श्रीनगर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (सिटी मुंसिफ) की अदालत में लंबित नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 (चेक बाउंस) से जुड़ी शिकायत को जम्मू की किसी सक्षम अदालत में ट्रांसफर करने की गुहार लगाई थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि 1990 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के कारण आतंकवादियों ने उसे निशाना बनाया था, जिसके बाद वह अपने परिवार के साथ जम्मू विस्थापित हो गया था। इसके साथ ही उसने अपनी खराब सेहत, कथित उत्पीड़न और शिकायतकर्ता द्वारा मारपीट किए जाने के दावों का भी हवाला दिया था। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि हालांकि याचिकाकर्ता ने रिलीफ कमिश्नर द्वारा जारी एक माइग्रेंट राशन कार्ड पेश किया है, लेकिन कश्मीर की मौजूदा सुरक्षा स्थिति उसके इस डर या आशंका का समर्थन नहीं करती है।
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अदालत ने कहा कि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वर्तमान में कश्मीर घाटी में आतंकवाद लगभग न के बराबर है और 1990 के बाद से स्थिति में भारी बदलाव आया है। कश्मीर के सभी राजनीतिक कार्यकर्ता कश्मीर प्रांत में वापस आ गए हैं और उन्होंने 1990 में आतंकवाद के उभार के बाद से कई बार चुनावी प्रक्रिया में भाग लिया है। इसलिए, याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसे अभी भी कश्मीर में अपनी जान का खतरा है, असंभावित प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने जांच में पाया कि निचली अदालत के रिकॉर्ड याचिकाकर्ता के जम्मू में रहने के दावों का पूरी तरह खंडन करते हैं। अदालत ने नोट किया कि मामले के समन याचिकाकर्ता के रात्सुन बीरवाह वाले पते पर तामील हुए थे। इसके अलावा, निचली अदालत के समक्ष दिया गया उसका बयान, पर्सनल बॉन्ड और पहचान पत्र जैसे सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज भी उसके इसी कश्मीरी पते की पुष्टि करते हैं।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद पुख्ता सबूत यह साफ दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ता कश्मीर में अपने मूल निवास स्थान पर वापस लौट चुका है। अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने निचली अदालत और उसके क्लर्क द्वारा प्रताड़ित किए जाने के आरोपों के संबंध में कोई ठोस विवरण या सबूत पेश नहीं किया। रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन जम्मू-कश्मीर आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 251 के तहत जब याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किया गया था, तब उसने अपना गुनाह स्वीकार किया था, जिसके बाद अदालत ने उसे शिकायतकर्ता को चेक की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह ट्रांसफर याचिका केवल चेक राशि के भुगतान से बचने और निचली अदालत की कार्यवाही में देरी करने के उद्देश्य से दायर की गई थी। याचिका में कोई योग्यता न पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और इस साल 27 जनवरी को जारी अंतरिम आदेश को भी रद्द कर दिया।
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जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह भी कहा कि कश्मीर के सभी राजनीतिक कार्यकर्ता घाटी में वापस लौट चुके हैं और पिछले कई वर्षों के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक व चुनावी प्रक्रियाओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। ऐसे में याचिकाकर्ता का यह दावा पूरी तरह से असंभव और अविश्वसनीय लगता है कि कश्मीर जाने पर उसकी जान को अभी भी खतरा है।
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उच्च न्यायालय ने यह फैसला सोनाउल्लाह डार नामक व्यक्ति की ट्रांसफर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने श्रीनगर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (सिटी मुंसिफ) की अदालत में लंबित नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 (चेक बाउंस) से जुड़ी शिकायत को जम्मू की किसी सक्षम अदालत में ट्रांसफर करने की गुहार लगाई थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि 1990 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के कारण आतंकवादियों ने उसे निशाना बनाया था, जिसके बाद वह अपने परिवार के साथ जम्मू विस्थापित हो गया था। इसके साथ ही उसने अपनी खराब सेहत, कथित उत्पीड़न और शिकायतकर्ता द्वारा मारपीट किए जाने के दावों का भी हवाला दिया था। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि हालांकि याचिकाकर्ता ने रिलीफ कमिश्नर द्वारा जारी एक माइग्रेंट राशन कार्ड पेश किया है, लेकिन कश्मीर की मौजूदा सुरक्षा स्थिति उसके इस डर या आशंका का समर्थन नहीं करती है।
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अदालत ने कहा कि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वर्तमान में कश्मीर घाटी में आतंकवाद लगभग न के बराबर है और 1990 के बाद से स्थिति में भारी बदलाव आया है। कश्मीर के सभी राजनीतिक कार्यकर्ता कश्मीर प्रांत में वापस आ गए हैं और उन्होंने 1990 में आतंकवाद के उभार के बाद से कई बार चुनावी प्रक्रिया में भाग लिया है। इसलिए, याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसे अभी भी कश्मीर में अपनी जान का खतरा है, असंभावित प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने जांच में पाया कि निचली अदालत के रिकॉर्ड याचिकाकर्ता के जम्मू में रहने के दावों का पूरी तरह खंडन करते हैं। अदालत ने नोट किया कि मामले के समन याचिकाकर्ता के रात्सुन बीरवाह वाले पते पर तामील हुए थे। इसके अलावा, निचली अदालत के समक्ष दिया गया उसका बयान, पर्सनल बॉन्ड और पहचान पत्र जैसे सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज भी उसके इसी कश्मीरी पते की पुष्टि करते हैं।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद पुख्ता सबूत यह साफ दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ता कश्मीर में अपने मूल निवास स्थान पर वापस लौट चुका है। अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने निचली अदालत और उसके क्लर्क द्वारा प्रताड़ित किए जाने के आरोपों के संबंध में कोई ठोस विवरण या सबूत पेश नहीं किया। रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन जम्मू-कश्मीर आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 251 के तहत जब याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किया गया था, तब उसने अपना गुनाह स्वीकार किया था, जिसके बाद अदालत ने उसे शिकायतकर्ता को चेक की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह ट्रांसफर याचिका केवल चेक राशि के भुगतान से बचने और निचली अदालत की कार्यवाही में देरी करने के उद्देश्य से दायर की गई थी। याचिका में कोई योग्यता न पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और इस साल 27 जनवरी को जारी अंतरिम आदेश को भी रद्द कर दिया।