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Srinagar News: ईपीजी की याचिका पर हाईकोर्ट ने मंडलायुक्त से जवाब मांगा
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की डिविजन बेंच का रुख किया है। उन्होंने नौगाम में बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील इलाके में प्रस्तावित औद्योगिकीकरण पर गंभीर चिंता जताई है और बाढ़ का पानी सोखने वाले बेसिन की सुरक्षा की मांग की है। यह मामला पहले से चल रही 2017 की पीआईएल के साथ उठाया गया है, जिसमें कश्मीर में बाढ़ से जुड़े मुद्दों पर अन्य मामले भी शामिल हैं।
मंगलवार को चीफ जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भट्टी और जस्टिस रजनेश ओसवाल की डिविजन बेंच ने ईपीजी की ओर से 27 अगस्त को दाखिल हलफनामे पर गौर किया। कोर्ट ने पाया कि हलफनामे में कुछ अहम मुद्दे उठाए गए हैं, जिनमें बाढ़ वाले इलाके में औद्योगिकीकरण भी शामिल है। कोर्ट ने कश्मीर के मंडलायुक्त को एक हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 29 अक्तूबर को होगी। ईपीजी की जनरल काउंसिल के सदस्य, वकील शफकत नजीर ने डिविजन बेंच के सामने यह मामला रखा। ईपीजी ने कहा कि उनकी दलीलों ने कोर्ट का ध्यान इस मुद्दे के इतिहास, इलाके के लिए लागू कानूनी योजना प्रावधानों और बाढ़ का पानी सोखने वाले जोन में स्थायी औद्योगिक निर्माण के संभावित नतीजों की ओर खींचा। ईपीजी ने कहा कि यह मामला श्रीनगर मास्टर प्लान-2035 की तैयारी और मंजूरी के समय का है। मास्टर प्लान पर विचार-विमर्श के अंतिम चरणों के दौरान, ईपीजी ने तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मलिक से संपर्क कर श्रीनगर में बाढ़ का पानी सोखने वाले इलाकों को बचाने की मांग की थी।
इसके बाद, श्रीनगर मास्टर प्लान-2035 को स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव काउंसिल ने 13 फरवरी 2019 के फैसले के जरिए मंजूरी दी थी। मास्टर प्लान को मंजूरी देते समय, सैक ने पंथा चौक-नौगाम बाईपास कॉरिडोर के संबंध में एक खास बदलाव किया और निर्देश दिया, पंथा चौक से नौगाम तक एनएच बाईपास के किनारे किसी भी तरह की विकास या निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि यह हिस्सा बाढ़ का पानी सोखने वाले बेसिन का हिस्सा है। ईपीजी ने कहा कि नौगाम में प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क को देखते हुए यह प्रावधान बहुत अहम हो जाता है।
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मास्टर प्लान को मंजूरी मिलने के बाद, ईपीजी ने सरकार और संबंधित अधिकारियों को औपचारिक पत्र और ज्ञापन भेजकर यह मुद्दा उठाना जारी रखा। उन्होंने प्लानिंग से जुड़े प्रावधानों और इलाके की बाढ़ सोखने की क्षमता को बनाए रखने के महत्व की ओर ध्यान दिलाया।
लगभग 50 एकड़ में फैले 104.02 करोड़ के प्रस्तावित प्लग-एंड-प्ले इंडस्ट्रियल पार्क ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। ईपीजी ने साफ किया कि उनकी चिंता औद्योगिक विकास, निवेश या रोजगार पैदा करने के खिलाफ नहीं है, बल्कि बाढ़ सोखने वाले बेसिन के तौर पर पहचाने गए इलाके में एक बड़ा स्थायी इंडस्ट्रियल एस्टेट बनाने के खिलाफ है। ईपीजी ने चेतावनी दी कि ऐसे इलाके में इंडस्ट्रियल एस्टेट बनाने से भारी बारिश और बाढ़ के दौरान गंभीर नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्थायी निर्माण से बाढ़ का पानी जमा करने की प्राकृतिक क्षमता कम हो सकती है, जल निकासी में बाधा आ सकती है। औद्योगिक बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों और आस-पास की आबादी के लिए जोखिम बढ़ सकता हैईपीजी ने मांग की है कि प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क की सही जगह और उसके दायरे की जांच श्रीनगर मास्टर प्लान-2035, सैक के फैसले, बाढ़ के पुराने पैटर्न, बाढ़ का पानी जमा करने की ज़रूरतों, प्राकृतिक जल निकासी चैनलों और व्यापक बाढ़ प्रबंधन प्रणाली के आधार पर की जाए। ग्रुप ने बाढ़ का पानी जमा करने की क्षमता में कोई कमी न हो के सिद्धांत का समर्थन किया है और कहा है कि जब तक साइट की कानूनी, प्लानिंग और हाइड्रोलॉजिकल स्थिति स्पष्ट न हो जाए, तब तक ऐसा निर्माण नहीं किया जाना चाहिए जिसे बदला न जा सके। ईपीजी ने डिवीजन बेंच के निर्देश का स्वागत करते हुए कहा कि इससे सरकार को कोर्ट के सामने पूरी तथ्यात्मक, प्लानिंग, पर्यावरणीय और हाइड्रोलॉजिकल स्थिति रखने का मौका मिलता है।
ग्रुप ने कहा कि वह कोर्ट के सामने अपने ज्ञापनों का इतिहास, मास्टर प्लान के संबंधित प्रावधान, सैक का कैसला और प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क से जुड़ी जानकारी रखेगा ।
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श्रीनगर। एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की डिविजन बेंच का रुख किया है। उन्होंने नौगाम में बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील इलाके में प्रस्तावित औद्योगिकीकरण पर गंभीर चिंता जताई है और बाढ़ का पानी सोखने वाले बेसिन की सुरक्षा की मांग की है। यह मामला पहले से चल रही 2017 की पीआईएल के साथ उठाया गया है, जिसमें कश्मीर में बाढ़ से जुड़े मुद्दों पर अन्य मामले भी शामिल हैं।
मंगलवार को चीफ जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भट्टी और जस्टिस रजनेश ओसवाल की डिविजन बेंच ने ईपीजी की ओर से 27 अगस्त को दाखिल हलफनामे पर गौर किया। कोर्ट ने पाया कि हलफनामे में कुछ अहम मुद्दे उठाए गए हैं, जिनमें बाढ़ वाले इलाके में औद्योगिकीकरण भी शामिल है। कोर्ट ने कश्मीर के मंडलायुक्त को एक हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 29 अक्तूबर को होगी। ईपीजी की जनरल काउंसिल के सदस्य, वकील शफकत नजीर ने डिविजन बेंच के सामने यह मामला रखा। ईपीजी ने कहा कि उनकी दलीलों ने कोर्ट का ध्यान इस मुद्दे के इतिहास, इलाके के लिए लागू कानूनी योजना प्रावधानों और बाढ़ का पानी सोखने वाले जोन में स्थायी औद्योगिक निर्माण के संभावित नतीजों की ओर खींचा। ईपीजी ने कहा कि यह मामला श्रीनगर मास्टर प्लान-2035 की तैयारी और मंजूरी के समय का है। मास्टर प्लान पर विचार-विमर्श के अंतिम चरणों के दौरान, ईपीजी ने तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मलिक से संपर्क कर श्रीनगर में बाढ़ का पानी सोखने वाले इलाकों को बचाने की मांग की थी।
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इसके बाद, श्रीनगर मास्टर प्लान-2035 को स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव काउंसिल ने 13 फरवरी 2019 के फैसले के जरिए मंजूरी दी थी। मास्टर प्लान को मंजूरी देते समय, सैक ने पंथा चौक-नौगाम बाईपास कॉरिडोर के संबंध में एक खास बदलाव किया और निर्देश दिया, पंथा चौक से नौगाम तक एनएच बाईपास के किनारे किसी भी तरह की विकास या निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि यह हिस्सा बाढ़ का पानी सोखने वाले बेसिन का हिस्सा है। ईपीजी ने कहा कि नौगाम में प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क को देखते हुए यह प्रावधान बहुत अहम हो जाता है।
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मास्टर प्लान को मंजूरी मिलने के बाद, ईपीजी ने सरकार और संबंधित अधिकारियों को औपचारिक पत्र और ज्ञापन भेजकर यह मुद्दा उठाना जारी रखा। उन्होंने प्लानिंग से जुड़े प्रावधानों और इलाके की बाढ़ सोखने की क्षमता को बनाए रखने के महत्व की ओर ध्यान दिलाया।
लगभग 50 एकड़ में फैले 104.02 करोड़ के प्रस्तावित प्लग-एंड-प्ले इंडस्ट्रियल पार्क ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। ईपीजी ने साफ किया कि उनकी चिंता औद्योगिक विकास, निवेश या रोजगार पैदा करने के खिलाफ नहीं है, बल्कि बाढ़ सोखने वाले बेसिन के तौर पर पहचाने गए इलाके में एक बड़ा स्थायी इंडस्ट्रियल एस्टेट बनाने के खिलाफ है। ईपीजी ने चेतावनी दी कि ऐसे इलाके में इंडस्ट्रियल एस्टेट बनाने से भारी बारिश और बाढ़ के दौरान गंभीर नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्थायी निर्माण से बाढ़ का पानी जमा करने की प्राकृतिक क्षमता कम हो सकती है, जल निकासी में बाधा आ सकती है। औद्योगिक बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों और आस-पास की आबादी के लिए जोखिम बढ़ सकता हैईपीजी ने मांग की है कि प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क की सही जगह और उसके दायरे की जांच श्रीनगर मास्टर प्लान-2035, सैक के फैसले, बाढ़ के पुराने पैटर्न, बाढ़ का पानी जमा करने की ज़रूरतों, प्राकृतिक जल निकासी चैनलों और व्यापक बाढ़ प्रबंधन प्रणाली के आधार पर की जाए। ग्रुप ने बाढ़ का पानी जमा करने की क्षमता में कोई कमी न हो के सिद्धांत का समर्थन किया है और कहा है कि जब तक साइट की कानूनी, प्लानिंग और हाइड्रोलॉजिकल स्थिति स्पष्ट न हो जाए, तब तक ऐसा निर्माण नहीं किया जाना चाहिए जिसे बदला न जा सके। ईपीजी ने डिवीजन बेंच के निर्देश का स्वागत करते हुए कहा कि इससे सरकार को कोर्ट के सामने पूरी तथ्यात्मक, प्लानिंग, पर्यावरणीय और हाइड्रोलॉजिकल स्थिति रखने का मौका मिलता है।
ग्रुप ने कहा कि वह कोर्ट के सामने अपने ज्ञापनों का इतिहास, मास्टर प्लान के संबंधित प्रावधान, सैक का कैसला और प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क से जुड़ी जानकारी रखेगा ।